
अरुणा रावत अरू, प्रसिद्ध लेखिका, नई दिल्ली
वो पहाड़, और एक नदी मैं।
कहाँ देख पाते हैं आँसू नदी के ये पहाड़!
वो तो बस अकड़ से तने अपनी ऊँचाई के सर को उठाए रहते हैं।
धरा पर बहती हुई नदी
जो प्रेम में कदाचित गुज़रती है उन पर से
वो समझते हैं नदी को आवारा बादलों की सखी।
गहराई नदी की
उसमें समा कर भी न जान पाते।
कहाँ देख पाते हैं आँसू नदी के ये पहाड़!
भूल जाते हैं ये बंजर, बर्फिले पहाड़
इनको हरा-जलित रखती है यही नदी।
जो है ये अस्तित्व तो नियम है ये नदी।
मैं जानती हूँ जीवन एक-दूसरे के होने से है।
फिर क्यों ऐ पहाड़, तुमको भ्रम है अपने ऊँचे होने से?
जबकि तुम ऊँचाई से नहीं गहराई के लिए पूर्ण होते हो नदी से।
फिर भी…
कहाँ देख पाते हैं आँसू नदी के ये पहाड़…
कभी देखो गहरें अपनी ऊँचाई को।
पाओगे, नदी टूट कर भी खंडित नहीं होती।
वो तुम पर ही गुज़रती है टूट कर भी अनेक रूपों में।
और तुम टूट कर हो जाते हो खंडहर।
न संभाल पाते हो बहती नदी को।
नदी फिर भी सिंचती है अपने आँसुओं से।
चाहती है स्पर्श तुम्हारा…
फिर भी निश्ठुर
कहाँ देख पाते हैं आँसू नदी के ये पहाड़!
तुम्हें समाना है मुझमें ही अंततः।
गहराई या मानो आँसुओं में
मैं बहूँगी तुम में।
बकौल तुम्हारे ठहर नहीं सकती तुममें।
फिर भी किसी बाँध से टूट कर
मैं नदी हूँ पहाड़ की।
मेरे आँसुओं से ही ऊँचाई प्यास की तुम में।
बढ़िया प्रस्तुति