
सुप्रसन्ना, प्रसिद्ध लेखिका, जोधपुर
न देखा किसी ने, पर हर ओर वही है,
साँसों की लय, धड़कनों की नबी है।
सूरज की रोशनी, चाँद की चाँदनी,
फूलों की मुस्कान, नदी की रागिनी।
हम सब उसी विराट ऊर्जा के कण,
जो बहते हैं समय के साथ अनंत गमन।
मोक्ष कहीं शून्य नहीं, यहीं जीवन का सार है,
सृष्टि से तादात्म्य ही उसका उपहार है।
करुणा, प्रेम, संवेदना जब हृदय में खिलती है,
तब ईश्वर को मन में खिलते देखा है।