
गुरप्रीत कौर, प्रसिद्ध लेखिका, बठिंडा
तुम दूर हो या क़रीब?
जब तुझसे बात नहीं होती, तो लगता है
हम फ़ासलों में तो नहीं।
क्या सिर्फ़ मैं ही बेचैन हूँ
तुमसे बात करने के लिए?
क्या मुलाक़ात के लिए तुम बेताब नहीं?
प्रेम जो करती हूँ मैं बेहिसाब तुझसे,
कहीं तुम हिसाब में तो नहीं?
दोष मेरा नहीं है,
तुमने कभी मुझे ख़ुद से
दूर रखा ही नहीं।
नज़दीकियाँ इस क़दर रही हैं
कि दूरियाँ क्या होती हैं,
इसका एहसास मुझे
कभी हुआ ही नहीं।
जानती हूँ मैं तुम्हारी व्यस्तता,
जो तुम्हारे हृदय में प्रेम है
मेरे लिए,
उस प्रेम से अनजान
मैं भी नहीं।
इंतज़ार जब बढ़ने लगता है,
तो सोच आ ही जाती है
कहीं तुम जा रहे हो
मुझसे दूर तो नहीं?