
पुष्पा पाठक, छतरपुर (मध्य प्रदेश)
सूरज रे तू बढ़ता चल,
तम के भय को हरता चल।।
थकी दिशाएँ हुई विकल,
आशा दीप जले प्रतिपल।।
सूरज रे तू बढ़ता चल,।।
रातों की लंबी चादर में,
सपनों को मत सोने दे।
जो रुक जाएँ हौसलों में,
उन पंखों को बोने दे।
खोना ना तू सुंदर पल।।
सूरज रे तू बढ़ता चल।।
राह में कांटे मिले अगर,
मुश्किल भरी है तेरी डगर।
मुस्कानों संग चलते चल,
ठोकर से भी कभी न डर।
हर मुश्किल का होता हल,
सूरज रे तू बढ़ते चल।।
कोहरे से भी नहीं हिला
सर्दी में भी नहीं गला।
बन उजास का दूत भला
सर्दी में तुझे प्यार मिला
चीर कुहासे का वक्षस्थल
सूरज रे तू बढ़ता चल,।।