शाश्वत कर्म

शाश्वत कर्म | श्रीकृष्ण भक्ति और कर्मयोग पर आध्यात्मिक कविता

डॉ. कृष्णा जोशी, प्रसिद्ध कवयित्री, गुजराती कॉलेज, इंदौर

दूर गगन की छांव में,आओ चलें ठहरें।
ये बादल लगने लगे कुछ नीले कुछ गहरे।।

दिन का उजाला अति सुन्दर मन को लुभाता रोज़।
सूर्य देव के प्रकाश में नाचे गाए सरोज।।

चिंताएं पल में मिटे देव कृपा से फिर।
अब मन बोझल रहता नहीं चंचलता की धीर।।

श्री राधे के नाम से उत्सव लगता मन।
कृष्ण बिना जीवन सूना प्रीत में पाई लगन।।

एक सहारा श्रीधर का बाकि सहारे व्यर्थ।
कर्म प्रधान लक्ष्य मेरा सत्य का सारा अर्थ।।

कूटनीति के चक्र में पीसते मानव सब।
गुरु द्वार एक तीर्थ है मन में बसे हैं रब।।

हरियाली चहुंओर है स्वर्ग लगे हैं धरा।
ईश्वर की सब लीला सब है करा धरा।।

कर्मयोगी योगेश्वर है जो माने वो संत।
अधर्मी का जीवन व्यर्थ है निकट है सब का अंत।।

मीठी बोली अमृत है कटु बोली में ज़हर।
छल कपट के वास्ते क्या क्या करता नर।।

सबका हित चाहे कृष्णा और ना मन में आस।
मुरलीधर के दर्शन की मन में रहती प्यास।।

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