…जब विदाई ने रोशनी ओढ़ ली

शोकाकुल घर में नेत्रदान की प्रक्रिया के बाद श्रद्धांजलि स्वरूप शांत वातावरण, मानवता और परोपकार को दर्शाता भावुक दृश्य। श्रीमती शकुंतला बोहरा

श्रीमती शकुंतला बोहरा का नेत्रदान : अंधेरे से उजाले तक की यात्रा

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे

महिदपुर रोड की पंजाबी मोहल्ला कॉलोनी उस सुबह असामान्य रूप से शांत थी। घर के आँगन में शोक की चुप्पी पसरी थी, आँखें नम थीं और शब्द मौन। श्रीमती स्व. शकुंतला बोहरा अब इस संसार में नहीं थीं, लेकिन उसी क्षण उनके जाने ने दो अनजानी ज़िंदगियों के लिए देखने की उम्मीद जगा दी थी।63 वर्ष की श्रीमती शकुंतला बोहरा, धर्मपत्नी स्व. श्री सुरेश जी बोहरा (जैन), का स्वर्गवास परिवार के लिए अपूरणीय क्षति था।

परंतु दुःख की इसी घड़ी में उनके परिवार ने ऐसा निर्णय लिया, जिसने मातृत्व, करुणा और मानवता की सबसे ऊँची परिभाषा रच दी।जब नेत्रदान की बात उठी, तो आँसू थमे नहीं, लेकिन इरादे डगमगाए भी नहीं। उनके सुपुत्र श्री नितिन बोहरा ने भारी मन से, पर दृढ़ संकल्प के साथ, माँ के नेत्रदान के लिए सहमति दी। यह केवल एक सहमति नहीं थी. यह उस माँ की जीवन-दृष्टि को आगे बढ़ाने का प्रण था, जिसने हमेशा दूसरों के लिए सोचना सिखाया।

श्री अजय चोरडिया के माध्यम से यह सूचना नेत्रदान, अंगदान एवं देहदान प्रेरक श्री जवाहर डोसी तथा पत्रकार पीयूष तक पहुँची। सूचना मिलते ही गीता भवन न्यास समिति ने तत्परता और संवेदनशीलता का परिचय दिया, मानो समय भी इस पुण्य कार्य के आगे नतमस्तक हो गया हो। 26 जनवरी 2026 की सुबह ठीक 9:58 बजे, गीता भवन न्यास समिति के नेत्रदान/देहदान प्रभारी डॉ. जी.एल. ददरवाल अपनी समर्पित टीम अजय कुमार चौरडिया, सचिन भंडारी (पत्रकार), राजेश कुमार (महिदपुर रोड), मनीष तलाच एवं परमानंद पंवार (गीता भवन न्यास समिति, बड़नगर) के साथ बोहरा निवास पहुँचे। आपसी समन्वय, सम्मान और मौन श्रद्धा के साथ नेत्र उत्सर्जन की प्रक्रिया संपन्न की गई। यह महिदपुर रोड क्षेत्र का 918वां नेत्रदान था। इस क्षण में शोक और सेवा एक-दूसरे में घुल गए। जिस घर में विदाई हो रही थी, वहीं कहीं दूर दो ऐसे चेहरे होंगे, जिनकी आँखों में अब उम्मीद का दीप जल उठेगा. जो पहली बार अपनों को देख पाएँगे, सूरज की रोशनी महसूस करेंगे, और जीवन को नए अर्थ के साथ अपनाएँगे।

गीता भवन न्यास समिति के अध्यक्ष श्री हरिकिशन मेलवाणी ने बोहरा परिवार के इस निर्णय को “विषम परिस्थितियों में लिया गया परोपकार का सर्वोच्च उदाहरण” बताया और परिवार के प्रति गहन कृतज्ञता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि ऐसे निर्णय समाज को दिशा देते हैं और नेत्रदान के प्रति जन-जागृति को सशक्त करते हैं।

श्रीमती शकुंतला बोहरा आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आँखों की रोशनी अब भी जीवित है. किसी की सुबह में, किसी की दुनिया में, किसी की मुस्कान में। यही नेत्रदान की सच्ची महिमा है.मृत्यु के बाद भी जीवन को देखने का अवसर देना।

उक्त उक्त जानकारी और फोटो जैन समाज के मीडिया प्रभारी श्री सचिन भंडारी द्वारा प्रदान की गई।

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