करतब दिखाते समय युवक बुरी तरह झुलसा,

फूल डोल चल समारोह के दौरान एक युवक करतब दिखाते समय बुरी तरह झुलस गया। घटना टॉवर चौराहे पर हुई, जहां अखाड़े का युवक गाड़ी पर चढ़कर मुंह में पेट्रोल डालकर आग के गोले बनाने का प्रदर्शन कर रहा था। इसी दौरान अचानक हादसा हो गया। प्रकाश नगर निवासी युवराज, पिता राजकुमार मरमट, इस हादसे…

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ग्रंथ रथ और मूषक वाद्य दल ने खींचा ध्यान

पुणे का गणेशोत्सव अपनी भव्य और रंगीन परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। इस दौरान विभिन्न प्रकार के दृश्यात्मक प्रदर्शन, जीवंत दृश्य, धार्मिक, शिक्षाप्रद और सामाजिक विषयों पर आधारित प्रस्तुतियाँ होती हैं, साथ ही विसर्जन यात्रा की भव्य परंपरा भी देखने को मिलती है।

घर-घर आयोजित होने वाले गणेशोत्सव भी इस परंपरा से अछूते नहीं हैं। सुभाषनगर स्थित जेधे परिवार ने इस वर्ष भी एक शानदार दृश्य प्रस्तुत किया। उनके घर शुक्रवार को हुई विसर्जन यात्रा ने सभी का ध्यान खींचा।

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राग, ताल और नृत्य से गूँजा बालगंधर्व रंगमंदिर

आशाजनक कलाकारों को मंच प्रदान करने के उद्देश्य से बीते 28 वर्षों से आयोजित किया जा रहा कावेरी परंपरा बालसंगीत महोत्सव इस वर्ष भी उत्साहपूर्ण माहौल में संपन्न हुआ। जंगली महाराज रोड स्थित बालगंधर्व रंगमंदिर में हुए इस आयोजन में नन्हें कलाकारों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा को जीवंत करते हुए अनुशासित और प्रभावी प्रस्तुतियाँ दीं। पुणे फेस्टिवल के अंतर्गत आयोजित इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता गायक राहुल देशपांडे, सुप्रसिद्ध तबला वादक निखिल फाटक तथा विख्यात कथक नृत्यांगना शर्वरी जमेनीस मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस अवसर पर कन्नड़ संघ के अध्यक्ष कुशल हेगड़े, उपाध्यक्षा इंदिरा सालियान और कोषाध्यक्ष राधिका शर्मा भी मौजूद रहे।

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पिताजी और शिक्षक दिवस

मेरे लिए पिताजी ही जीवन के पहले शिक्षक थे। उनकी डाँट में करुणा थी और उनकी कठोरता में भी प्रेम छिपा था। उन्होंने केवल पढ़ाया नहीं, बल्कि सच्चाई, ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ जीना सिखाया। अद्भुत संयोग यह रहा कि शिक्षक होकर वे इसी शिक्षक दिवस के दिन इस संसार से विदा हुए—और अपने जीवन से यह अंतिम संदेश छोड़ गए कि सच्चा शिक्षक वही है, जो अपने आचरण और आदर्श से पीढ़ियों को दिशा देता है।

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राधाकृष्णन की रोशनी में आज का अँधेरा पढ़ना

आज हम शिक्षक दिवस मनाते हैं—पर यह महज़ कैलेंडर की औपचारिक तारीख़ नहीं, एक विचार की परीक्षा है। इस दिन का अर्थ तभी पूरा होता है जब हम डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को किताबों के अध्याय से बाहर निकालकर अपने समय की नब्ज़ पर रख दें। वे केवल दार्शनिक, कुलपति या भारत के दूसरे राष्ट्रपति नहीं…

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थर्मामीटर…

मनुष्य स्वयं को नियंता मानता है—मछलीघर का, उसके तापमान का, याक और उनकी देखरेख का। पर वास्तव में वह अपनी ही सीमाओं में कैद है, मछलियों की तरह निश्चित तापमान पर निर्भर। कभी जेब में पड़े नोट उसे ठंडक का अहसास कराते हैं, तो कभी वही गर्माहट देते हैं। बाहर से देखने पर मछलियों का कंकड़ भरना और उगलना निरर्थक लगता है, ठीक वैसे ही जैसे याक के सींगों पर चढ़ाए कवर और लगामें। असल में, आदमी की हरकतें भी उन्हीं की तरह अजीब और निरर्थक लग सकती हैं, क्योंकि अपनी लगाम उसने सौंप रखी है अनदेखी शक्तियों और बेजान नोटों को

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हश्र..

आज वही देवतुल्य बेटा, जिसके जन्म पर पूरा घर-आँगन गूँज उठा था, सरे-बाज़ार नंग-धड़ंग खड़ा है—इज़्ज़त के नाम पर। जिस बेटे के लिए माँ ने मन्नतों के धागे बाँधे थे, दादी ने मिठाइयाँ बाँटी थीं और बधाई गीत गाए थे, आज वही बेटे के संस्कार समाज के सामने नंगे खड़े हैं।

कभी पोते के स्वागत में पतोहू को चुनरी ओढ़ाई गई थी, बुआ ने देहरी पर नेग के लिए अड़ गई थी, भाभी के कंगन उतरवाए गए थे और दादा ने सातों पत्तलों पर भोज करवा शान से जश्न मनाया था। किन्नरों को बुलाकर डैडी ने चाँदी के सिक्के उछाले थे। यह सब उस इकलौते कुलदीपक के नाम पर हुआ, जिसे देवपुत्र की तरह पूजा गया।

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गुरु का स्पर्श, सफलता का मार्ग

शिक्षक वास्तव में जीवन के सृजनहार हैं। जैसे कुम्हार कच्ची मिट्टी को चाक पर घुमाकर आकार देता है, वैसे ही शिक्षक बच्चों के कोमल मन को गढ़कर उन्हें दिशा और स्वरूप प्रदान करते हैं। माता-पिता हमें जन्म देते हैं, परंतु चरित्र की नींव और मूल्यों का उपहार शिक्षक ही देते हैं।
शिक्षक केवल पाठ नहीं पढ़ाते, वे विचारों को नई धार देते हैं और भविष्य को संवारते हैं। वे बच्चों के भीतर आत्मविश्वास जगाते हैं, चुनौतियों का सामना करने की क्षमता पैदा करते हैं और सफलता की ओर बढ़ने का मार्ग दिखाते हैं। जब विद्यार्थी प्रगति पथ पर आगे बढ़ते हैं और नई ऊँचाइयाँ प्राप्त करते हैं, तो उनकी उपलब्धियों में शिक्षक की मेहनत और प्रेरणा की झलक साफ़ दिखाई देती है।

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गुरु की छाया में गढ़ता जीवन

शिक्षक जीवन के आधार स्तंभ होते हैं। जैसे कुम्हार कच्ची मिट्टी को चाक पर घुमाकर नया आकार देता है, वैसे ही शिक्षक बच्चों के कोमल और अबोध मन को गढ़ते हैं। बचपन में माता-पिता से बोलना, चलना और सहारा लेना सीखा जाता है, लेकिन जब शिक्षा के मंदिर में पहला कदम रखा जाता है, तब बच्चा पहली बार माता-पिता का हाथ छोड़कर एक नए वातावरण में प्रवेश करता है।

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संस्कृत भाषा और संस्कृत पत्रिका

एक दिन कुछ बच्चों के बीच बैठी मैं पत्रिकाओं की और उसे पढ़ने की बात कर रही थी। उसी क्रम में मैंने उनसे संस्कृत पत्रिकाओं के बारे में पूछा तो वे हँस पड़े। बोले – “संस्कृत तो यूँ भी डेड भाषा है आंटी! उसकी पत्रिका कैसे निकल सकती है? और कौन पढ़ेगा?”

शायद वे सही कह रहे थे।
आज जब बोलियाँ समय के बहाव में सिर्फ एक भाषा अंग्रेज़ी और शहरीकरण के कारण मर रही हैं, तो वर्षों पहले की संस्कृत पत्रिकाओं को ये बच्चे कैसे जान सकते हैं? कैसे जान सकते हैं कि महर्षि पाणिनि की रची यह भाषा कई भाषाओं की जननी है, जिसे दशम मंडलों की भाषा कहा जाता है, वैदिक भाषा कहा जाता है और जिसे हम देववाणी कहते हैं।

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