मौन रात्रि और स्वप्निल वेदना

अँखियाँ रात भर प्रेमिल स्वप्नों में जागती रहीं और रात भोर की प्रतीक्षा में ठहरी रही। मौन ओढ़े मानिनी-सी पीड़ा सहती रही, मगर अपनी वेदनाएँ किसी से न कह सकी और गरल पीकर भी चुप रही। भावनाओं के पारिजात बिखेरकर, श्वेत वस्त्रों में सजी वह सुरभित यामिनी को पीछे छोड़ चली गई।

श्यामल मेघों से घिरी रात में दीपशिखा मद्धम पड़ गई और अमावस की निस्तब्धता में झरती रही चाँदनी। उसके अंतर्मन की कोमलता ओस की बूँदों-सी पारदर्शी थी। वही मधुरिमा उसकी लेखनी से बही और हृदय के फूलों-सी कोमल पंक्तियों में खिल उठी।

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इस बार मैं चुप रहूंगी

उस दिन एक स्पर्श हवा में ठहर-सा गया था, ठीक उसी क्षण जब शब्दों ने जन्म लेना ही चाहा था। तुम्हारी बात सिर्फ मेरे कानों तक नहीं पहुँची, वह सीधे भीतर तक उतर आई थी। मगर भाषा की गलियाँ उन दिनों बहुत संकरी थीं। खिड़की आधी ही खुली थी और बादलों ने कोई वादा नहीं किया था—न थमने का, न बरसने का।

स्मृति आज भी वहीं अटकी है, जहाँ तुमने मुझे बिना कुछ कहे देखा था। उस शाम समय बहुत तेज़ी से गुज़र गया था, या शायद वह ऊबकर किनारे खड़ा रह गया था। मुझे लगा था कि तुम कुछ कहना चाहते हो, और मैं अपनी घबराहट में, कुछ न कहकर भी सब कुछ कह चुकी थी। अब अगर तुम फिर से मिलो, तो मैं इस बार चुप रहूँगी। कुछ नहीं कहूँगी—बस तुम्हें लिख दूँगी। और अगर हो सके, तो तुम बस पढ़ लेना।

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उम्मीदों की खिड़की से

ज़िंदगी में कितनी ही मुश्किलें क्यों न आएँ, उम्मीदों की खिड़की हमेशा खुली रहनी चाहिए। दुनिया कुछ भी कहे, लेकिन अपने हौसले को मज़बूत बनाए रखना ज़रूरी है। आंधियाँ आएँ तो भी दिल का दिया जलता रहना चाहिए। इंसान को पत्थर नहीं बनना है, बल्कि टूटकर और तराशकर अपने आप को बेहतर बनाना है। इम्तिहान तो जीवन में बार-बार आएँगे, लेकिन हर बार हमें अपने लक्ष्य पर टिके रहना है। यही उम्मीद और यही हौसला हमें आगे बढ़ने की ताकत देते हैं।

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खंडहर महल

कभी ये महल रोशनी और रौनक से भरे रहते थे। उनकी दीवारों पर तस्वीरें मुस्कुराती थीं और झरोखों से सपनों की हवाएँ बहती थीं। लेकिन आज वही महल खामोश और वीरान खड़े हैं। उनकी दरारों में घास उग आई है और सन्नाटा इतना गहरा है कि बस हवा की गूंज सुनाई देती है, जैसे वक्त सब कुछ चुपचाप चुरा ले गया हो। जहाँ कभी कदमों की आहट और राग–रंग की महफ़िलें सजती थीं, वहाँ अब धूल और पत्थरों की चादर बिछी है। ये खंडहर सिर्फ टूटे पत्थर नहीं, बल्कि समय के साक्षी हैं, जो बताते हैं कि वैभव मिट जाता है, पर इतिहास हमेशा जीवित रहता है।

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पुणे में गूंजेगा सुरों का संगम

गुरुकुल कलाश्री संगीत मंडल और द औंध सोशल फाउंडेशन संयुक्त रूप से 12वां *भारत रत्न पं. भीमसेन जोशी संगीत महोत्सव* 12, 13 और 14 सितंबर को औंध स्थित *भारत रत्न पं. भीमसेन जोशी रंगमंदिर* में आयोजित कर रहे हैं। यह जानकारी आज आयोजित प्रेस कॉन्फ़्रेंस में  गुरुकुल कलाश्री संगीत मंडल  के संस्थापक एवं किराना घराने के गायक पं. सुधाकर चव्हाण  और द औंध सोशल फाउंडेशन के संस्थापक एवं अध्यक्ष, आर्किटेक्ट  अभिजीत सुभाष गायकवाड़  ने दी।
महोत्सव तीनों दिनों में शाम 5 बजे से रात 10 बजे तक होगा।

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पुणे की महिलाओं ने बनाया नया वर्ल्ड रिकॉर्ड

पुणे के गणेशोत्सव को और भी यादगार बनाते हुए ढोले पाटील शैक्षणिक संस्था ने एक नया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है. संस्था के अध्यक्ष सागर उल्हास ढोले पाटिल के नेतृत्व में, सर्वाधिक नागरिकों ने एक साथ दीप जलाकर आरती की और नया विश्वविक्रम स्थापित किया. खास बात यह रही कि आरती करने वाली सभी महिलाएं थीं
इस आयोजन ने उत्तर प्रदेश के अयोध्या स्थित सरयू आरती समिति का वह पिछला रिकॉर्ड तोड़ दिया जिसमें दिवाली पर सबसे अधिक लोगों ने एक साथ दीपों से आरती की थी

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पैंतीस-चालीस की स्त्री

“पैंतीस-चालीस की स्त्री—घर की रौनक, रिश्तों की संरक्षक, प्रेम और वात्सल्य की सजीव प्रतिमूर्ति। बिना किसी दवा या शौक के, जीवन में खुशियाँ और आशा फैलाती। सच में, ये स्त्री कितनी खूबसूरत होती है।”

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विश्व आत्महत्या प्रतिबंध दिवस पर कैंडिल मार्च 13 को

पुणे:जागतिक आत्महत्या प्रतिबंध दिवस (World Suicide Prevention Day) के अवसर पर पुणे में मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता फैलाने के लिए कैंडल मार्च का आयोजन किया जा रहा है। यह पहल कनेक्टिंग ट्रस्ट और रोटरी क्लब ऑफ पुणे सारसबाग की ओर से की जा रही है। मार्च शनिवार, 13 सितंबर 2025, को शाम 6 बजे संभाजी उद्यान,…

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मध्य प्रदेश को ‘सर्वश्रेष्ठ राज्य पर्यटन बोर्ड’ पुरस्कार से नवाजा गया

मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड (MPTB) को प्रतिष्ठित सर्वश्रेष्ठ राज्य पर्यटन बोर्ड पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान 9 सितंबर को ले मेरिडियन, नई दिल्ली में आयोजित भव्य इंडिया ट्रैवल अवार्ड्स 2025 समारोह में केंद्रीय पर्यटन और संस्कृति मंत्री, श्री गजेंद्र सिंह शेखावत द्वारा प्रदान किया गया। यह राष्ट्रीय स्तर की मान्यता मध्य प्रदेश के पर्यटन क्षेत्र में नवाचार, उत्कृष्टता और सतत विकास में नेतृत्व को दर्शाती है।

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मैं कब से थी नीर की बदरी

कविता में एक स्त्री अपनी जीवन-यात्रा को स्मरण करती है। वह बताती है कि बचपन में वह माता-पिता की दुलारी थी—माँ की गुड़िया और पिता की आँखों की पुतली। आँगन और गलियों में सखियों संग खेलते-खेलते उसने प्रेम और रिश्तों को सँजोया।

फिर सपनों से भरे मन के साथ विवाह के बाद विदा हुई, नए रिश्तों की डोर बाँधी। परंतु आगे चलकर उसका जीवन वैसा सुखद नहीं रहा। पवित्र दांपत्य बंधन टूट गया, कई रातें अधूरी रह गईं। उसकी आँखें बरसती रहीं, पर मन का आँगन सूखा पड़ा रहा। इस कविता में बचपन की निश्छलता, विवाह का सपना और फिर विरह तथा विफलता की वेदना—तीनों भाव गहराई से व्यक्त हुए हैं।

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