चरित्र …

चरित्र की व्याख्या समाज ने हमेशा अपने दृष्टिकोण से की है – पुरुष का चरित्र उस पन्नी जैसा है जो टपकती हुई छत पर बांध दी जाती है। चाहे वह कितनी भी मैली हो जाए, वह दीवारों को सीलन से बचाने का काम करती रहती है – बिना कोई प्रश्न किए, बिना कोई उंगली उठाए, बस चुपचाप अपना दायित्व निभाती है।

औरत का चरित्र उस घर की देहरी है, जिसे चाहे जितना भी अल्पना से सजा लिया जाए, उसे पांव मारकर मटियामेट करने का जन्मसिद्ध अधिकार हर किसी को प्राप्त होता है – घर के अंदर वाले को भी और बाहर वाले को भी।

पुरुषों का चरित्र पुरुषों से सदैव सुरक्षित रहता है। वे आपस में महफिलें सजाते हैं, एक-दूसरे की चुप्पियों का सम्मान करते हैं, और “तेरी भी चुप, मेरी भी चुप” के सिद्धांत पर चलते हुए सहजता से जीवन का आनंद लेते हैं।

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सम्मान की सूखी रोटी

मैंने तुम्हारी बातों में आकर अपना परिवार छोड़ दिया और तुमने मुझे धोखा दिया,” प्रियांशी के स्वर में टूटे हुए सपनों की गूंज थी। लेकिन जवाब में जो मिला, वो और भी ज़्यादा चुभने वाला था – “तुम जैसी औरतों की कोई इज्जत नहीं…”

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खिड़की के पास बैठा लेखक, वैचारिक लेखन में डूबा हुआ दृश्य

ज्ञान नहीं, बदलाव लिखिए

लेखन का उद्देश्य केवल ज्ञान बाँटना नहीं, बल्कि स्वयं से शुरू होने वाला परिवर्तन होना चाहिए। जब लेखन आत्मचिंतन बनता है, तभी वह समाज को दिशा देता है।

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धुंध में धुन

नागालैंड के एक छोटे से गांव की धुंधभरी सुबह में लिमा की आंखों में अपने खोए हुए भाई अतोई की यादें तैर रही थीं। पहाड़ों की खामोशी में उसे उसकी आवाज़ सुनाई देती थी। जब अचानक, उत्सव की रात धुंध में से अतोई की परछाई उभरी, तो लिमा की आँखों से बहते आंसुओं में उम्मीद की रोशनी चमक उठी। आमा की कहानियाँ और पहाड़ों का विश्वास सच हो गया—“पहाड़ अपने बच्चों को कभी तन्हा नहीं छोड़ते।”

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क्रिकेट मैदान में खेलती लड़कियाँ महिला सशक्तिकरण और आत्मविश्वास का प्रतीक बनती हुई

लड़कियाँ क्रिकेट खेल रही हैं…

ह कविता क्रिकेट के मैदान में उतरती लड़कियों के माध्यम से महिला सशक्तिकरण, आत्मविश्वास और सामाजिक रूढ़ियों के टूटने की कथा कहती है। चौके-छक्कों से लेकर इतिहास रचने तक, यह रचना बताती है कि खेल कैसे करोड़ों लड़कियों के भीतर साहस और आकाश छूने की आकांक्षा जगा रहा है।

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“एक जैकेट, एक बच्चा… और पूरा समाज नंगा”

सर्दियों की परतों में लिपटा एक आदमी, और उसी सड़क पर नंगे पाँव खड़ा एक बच्चा हितेश। कुछ ही सवालों में उसकी पूरी दुनिया खुल जाती है: शराब में डूबे पिता, रजाइयाँ बेचती माँ, स्कूल से कोसों दूर सपने, और नीम के नीचे गुज़ारी हर रात। ठिठुरन उस बच्चे की नहीं, उस आदमी की आत्मा में घुसती है, जो अपनी जैकेट उतारकर भी खुद को नग्न महसूस करता है। हितेश की मासूमियत जैकेट पर डियो छिड़ककर “आपसे बदबू नहीं आएगी” कहना उसकी गरीबी से कहीं ज़्यादा क्रूर है।

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इंसानियत…

मुंबई बाढ़ का वो दिन मेरे लिए हमेशा के लिए यादगार बन गया. दोपहर बारह बजे से शाम पांच बजे तक मैं कुर्ला और सायन के बीच फँसी रही, फिर भी घर पहुँचने के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे थे.
ट्रेन में बैठते ही लगा कि यह तो आम बरसात है, क्योंकि ट्रेन सामान्य गति से चल रही थी. लेकिन विद्याविहार के बाद जैसे ही ट्रेन रुकी, परेशानियाँ शुरू हो गईं. कुर्ला पहुँचने में आधा घंटा लग गया और वहाँ से थोड़ी देर चलकर ट्रेन फिर आऊटर पर रुक गई और बस वहीं अटक गई.
घड़ी के काँटे घूमते रहे, एक… दो… तीन… चार… पाँच बज गए. बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी.
कंपार्टमेंट में पहले तो सब सामान्य थे, किसी को अंदाज़ा नहीं था कि परेशानी इतनी लंबी खिंच सकती है. धीरे-धीरे लोगों ने घर और ऑफिस में खबर दे दी कि ट्रेन में फँसे हैं, देर हो सकती है.

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बच्चों का बदलता व्यवहार

बचपन के वो दिन अब दूर हो गए जब बच्चे मां के आंचल में सुकून ढूंढते और पिता की बातों में जीवन का ज्ञान पाते। गलियों और मैदानों में खेल, दादी-नानी की कहानियाँ और माता-पिता का आदर अब कहीं खो सा गया है। आज बच्चे मोबाइल की स्क्रीन और डिजिटल दुनिया में खोए हुए हैं।पहले जैसा प्यार और सम्मान अब कम नजर आता है, माता-पिता की सीख बोझ लगती है और संस्कार भूलते जा रहे हैं। पढ़ाई का दीपक मंद पड़ता है और सपनों का आंगन सिकुड़ता है।
फिर भी उम्मीद बाकी है। यदि माता-पिता बच्चों को प्यार और समझ से मार्गदर्शन देंगे, तो उनका भविष्य और संस्कार फिर से चमकने लगेंगे।

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जीवन जंग नहीं

यह कविता जीवन को केवल संघर्ष और काँटों से भरा हुआ मानने की मानसिकता को तोड़ती है। कवि कहता है कि जीवन सिर्फ कठिनाइयों और कटु अनुभवों का नाम नहीं है, बल्कि इसमें फूलों जैसी सुंदरता, मधुरता और उमंगें भी समाई हुई हैं।
जीवन की राह में यदि कोई विचलित होकर बीच में ही रुक जाए तो वह अपने लक्ष्य तक कभी नहीं पहुँच सकता। पराजय के डर से भागने वाला कभी विजयी नहीं कहलाता। अंधकार से भयभीत होकर रुकने वाला व्यक्ति प्रकाश की ओर कदम नहीं बढ़ा सकता। दूरी से हताश होने वाला कभी मंज़िल तक नहीं पहुँच पाता।

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पैंतीस-चालीस की स्त्री

“पैंतीस-चालीस की स्त्री—घर की रौनक, रिश्तों की संरक्षक, प्रेम और वात्सल्य की सजीव प्रतिमूर्ति। बिना किसी दवा या शौक के, जीवन में खुशियाँ और आशा फैलाती। सच में, ये स्त्री कितनी खूबसूरत होती है।”

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