वो घर मेरा
सालों बाद जब कोई अपने पुराने घर लौटता है, तो दीवारें भी जैसे बोल उठती हैं। यह कविता उसी एहसास को बयां करती है जहां कभी हँसी गूंजती थी, आज वहां खामोशी है, और यादों की नमी हर कोने में बसती है।

सालों बाद जब कोई अपने पुराने घर लौटता है, तो दीवारें भी जैसे बोल उठती हैं। यह कविता उसी एहसास को बयां करती है जहां कभी हँसी गूंजती थी, आज वहां खामोशी है, और यादों की नमी हर कोने में बसती है।
हिंदी ने वर्षों से भारतीय संस्कृति, साहित्य और जनजीवन में गहरी जड़ें जमा रखी हैं। यह अपने देश में राजभाषा के रूप में पूर्ण सम्मान की आकांक्षा रखती है। विदेशी विश्वविद्यालयों और विश्व हिंदी सम्मेलनों में इसका सम्मान है, मगर अपने देश में इसे संवैधानिक रूप से राष्ट्रभाषा घोषित नहीं किया गया। यह पाठ हिंदी के गौरव, संघर्ष और उसके महत्व को बखूबी उजागर करता है।
‘किताब दिल में, लैपटॉप हाथ में’ कविता किताबों की आत्मीयता, काग़ज़ की खुशबू और डिजिटल दौर की तेज़ रफ़्तार के बीच छुपे भावनात्मक संघर्ष को व्यक्त करती है। यह रचना बदलते समय को स्वीकारते हुए भी दिल में बसती किताबों की अमिट जगह को संवेदनशील शब्दों में उकेरती है।
यह कविता मानो दो हृदयों के बीच बसा एक मधुर संवाद है। कवि मौन को तोड़ने की विनती करता है, ताकि प्रेम की अनुभूति केवल हृदय में ही न रहे बल्कि शब्दों और भावों में भी प्रकट हो सके। इसमें अनुराग, लज्जा और समर्पण का सहज प्रवाह है। कहीं प्रेयसी का श्रृंगार उसकी प्रतीक्षा का प्रतीक बनता है तो कहीं प्रियतम का एक संकेत ही उसकी जीत ठहरता है। यह रचना प्रेम की उस अनकही भाषा को गूँज देती है, जिसमें मौन भी बोलता है और दृष्टि भी गीत गाती है।
महिदपुर रोड में वर्ष 2026 का भव्य चातुर्मास डॉ. साध्वी अमृतरसा श्री जी म.सा. के सान्निध्य में आयोजित होगा। चार माह तक नगर में जप, तप, साधना और धर्म-ज्ञान की अविरल गंगा प्रवाहित होगी।
स्नेह, सम्मान और साहित्य के त्रिवेणी संगम में सम्पन्न हुआ ‘विशाखा’ का विमोचन केवल एक पुस्तक-प्रस्तुति नहीं, बल्कि संवेदनाओं का उत्सव था। बिना किसी भव्य मंच के, आत्मीय वातावरण में शब्दों ने आत्मा से संवाद किया और बिहार की दो बेटियों के संकल्प ने ‘मिलकर प्रेरित करें बिहार’ को जीवंत अर्थ दे दिया।
“आधुनिक जीवन की भागदौड़, अहंकार, संवाद की कमी और संस्कारों से दूर होती नई पीढ़ी इन सबने विवाह जैसे पवित्र बंधन को कमजोर कर दिया है। परिवार का ताना-बाना बिखर रहा है, संयुक्त परिवार टूट चुके हैं और रिश्तों में धैर्य व समझदारी कम होती जा रही है। यही कारण है कि विवाह-विच्छेद बढ़ते जा रहे हैं।”
यह कविता हिंदी भाषा के महत्व और सांस्कृतिक धरोहर को उजागर करती है। इसमें बताया गया है कि हमारी भावनाएँ, प्रेम, ज्ञान और भक्ति—सभी हिंदी में अभिव्यक्त होती हैं। पहले शब्दों से लेकर वेद, उपनिषद और गीता तक, पूजा-अर्चना और भजन तक, हिंदी भाषा हमारे जीवन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। हिंदी दिवस का यह संदेश हमें अपनी मातृभाषा को पढ़ने, लिखने और अपनाने के लिए प्रेरित करता है।
“आओ चाय बनाए” एक भावनात्मक आमंत्रण है, जिसमें चाय बनाने की प्रक्रिया को एक प्रेमपूर्ण और सांस्कृतिक अनुष्ठान के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह कविता सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि आत्मीयता, मिलन और घरेलू सौंदर्य की प्रतीक है। मसालों की सुगंध, शक्कर की मिठास और चाय की पत्ती की उबाल के साथ मित्रता और अपनापन भी घुलता है। यह कविता हर उस व्यक्ति को बुलाती है जो रिश्तों की गर्माहट को महसूस करना चाहता है — एक प्याले चाय के साथ।