फूलों की गुफ़्तगू…

फूलों की महक में जैसे कोई नर्म-सा सवाल छुपा था। हम रुके तो उन्होंने आहिस्ता से गुफ़्तगू शुरू कर दी। हमने भी दिल का हाल कह दिया. वो बातें, जो बरसों से किसी को न बताई थीं। अजीब ये हुआ कि हमारी हर बात पर फूल और भी महकने लगे, मानो मोहब्बत ने उन्हें भी अपनी गिरफ़्त में ले लिया हो। अब बाग़ की हर कली यूँ मुस्कुराती है, जैसे हमारी रूह से उनका कोई पुराना नाता हो।

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खुशी

“खुशी की सबसे बड़ी बाधा अक्सर हम खुद होते हैं। जो बातें हमारे नियंत्रण में नहीं, उन पर सोचते रहने से नकारात्मकता हमें घेर लेती है। दिनचर्या में थोड़ा बदलाव, मनपसंद काम के लिए समय और परोपकार यही आत्मा की सबसे सच्ची खुशी है।”

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विधवाओं की दशा पर केंद्रित स्मारिका का लोकार्पण

महिला जागृति अभियान की पाँचवीं वर्षगांठ के अवसर पर इंदौर में आयोजित एक भव्य समारोह में वरिष्ठ साहित्यकार अरुणा खरगोनकर द्वारा संपादित विधवाओं की दशा पर केंद्रित स्मारिका का लोकार्पण किया गया. आयोजन विचार प्रवाह साहित्य मंच के तत्वावधान में इंदौर प्रेस क्लब स्थित एक रेस्तरां के सभागार में हुआ, जहाँ बड़ी संख्या में महिलाएँ उपस्थित थीं.कार्यक्रम का शुभारंभ महाराष्ट्र में विधवा प्रथा उन्मूलन आंदोलन के जनक प्रमोद झिंझड़े, वरिष्ठ पत्रकार व समाजकर्मी प्रसून लतांत, इंदौर प्रेस क्लब के मुकेश तिवारी, विचार प्रवाह साहित्य मंच की अध्यक्ष सुषमा दुबे और समाज चिंतक मनीष खरगोनकर ने संयुक्त रूप से किया.

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संदूक भर जीवन

घर के पिछले कमरे में रखा वह पुराना संदूक अब एक वस्तु नहीं रहा, वह मानो माँ के जीवन की पूरी कथा समेटे बैठा है। उसमें मायके की यादें हैं, विवाह की रस्मों के निशान हैं, और मातृत्व के पहले क्षणों की सोंधी गंध अब भी बसी है। हर वस्तु, हर दस्तावेज़ किसी बीते समय की गवाही देता है — मनीऑर्डर का पन्ना, साइकिल की रसीद, गाँव का ढहता इतिहास।
माँ के झुर्रियों वाले हाथ जब उसे छूते हैं, तो उनमें फिर वही स्फूर्ति लौट आती है, जैसे वर्षों पीछे लौट गई हों। और मैं, उस संदूक को निहारते हुए, महसूस करती हूँ कि उसमें सिर्फ़ माँ का ही नहीं, मेरा भी जीवन धीरे-धीरे सिमट आया है — तस्वीरों, कपड़ों और दस्तावेज़ों के रूप में। यही तो है “संदूक भर जीवन।”

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गोल्डन टेम्पल मेल अब बांद्रा से ही चलेगी.

गोल्डन टेम्पल मेल अब बांद्रा से ही चलेगी

गोल्डन टेम्पल मेल का टर्मिनल बदलाव अगले छह माह तक जारी रहेगा. ट्रेन संख्या 12903 और 12904 अब मुंबई सेंट्रल के बजाय बांद्रा टर्मिनस से ही संचालित होंगी. यात्रा से पहले अपडेट जरूर देखें.

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मौन रात्रि और स्वप्निल वेदना

अँखियाँ रात भर प्रेमिल स्वप्नों में जागती रहीं और रात भोर की प्रतीक्षा में ठहरी रही। मौन ओढ़े मानिनी-सी पीड़ा सहती रही, मगर अपनी वेदनाएँ किसी से न कह सकी और गरल पीकर भी चुप रही। भावनाओं के पारिजात बिखेरकर, श्वेत वस्त्रों में सजी वह सुरभित यामिनी को पीछे छोड़ चली गई।

श्यामल मेघों से घिरी रात में दीपशिखा मद्धम पड़ गई और अमावस की निस्तब्धता में झरती रही चाँदनी। उसके अंतर्मन की कोमलता ओस की बूँदों-सी पारदर्शी थी। वही मधुरिमा उसकी लेखनी से बही और हृदय के फूलों-सी कोमल पंक्तियों में खिल उठी।

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…जब कपड़ा लंबा-सिलता था और बचपन भी

आलमारी खोली तो कपड़े बहुत थे, पर एक भी प्रेस किया हुआ नहीं। कपड़ों का ढेर देखते ही बाबूजी याद आ गए जब साल में बस दो बार नए कपड़े सिलते थे। बसंती दा से उधारी में कपड़ा लेना, टेलर की दुकानों के चक्कर, “थोड़ो लंबो-जंबो सिलजो, बच्चा बढ़ रहा है” की आवाज़, और नए कपड़ों के इंतज़ार का उत्साह… आज भले मॉल में पहनकर घर आ जाएं, पर वो इंतज़ार, वो खुशी, अब कहीं नहीं मिलती।

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जहाँ कुचली जाती है, वहीं उगती है स्त्री

“जिन्हें तोड़ा जाता है, वे पीपल के समान फिर उगते हैं — पूरी शिद्दत के साथ।
जहाँ उम्मीदें नहीं होतीं, वहाँ भी हरे-भरे बने रहते हैं।
स्त्रियाँ भी ऐसी ही होती हैं — जहाँ कुचली जाती हैं,
वहीं अत्यंत सहनशीलता के साथ दोबारा उगती हैं।

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मां बनकर ढाल बनी आंगनवाड़ी रसोइया, मधुमक्खी हमले में बचाए 20 बच्चे

मधुमक्खियों के सैकड़ों डंक झेलकर 20 बच्चों को बचाया

उस सुबह आंगनवाड़ी परिसर में बच्चों की हंसी गूंज रही थी। किसी ने नहीं सोचा था कि कुछ ही मिनटों में यह जगह चीखों, अफरा-तफरी और मौत से टकराने वाली बहादुरी की गवाह बनने वाली है।
अचानक मधुमक्खियों का एक झुंड आंगनवाड़ी में खेल रहे बच्चों पर टूट पड़ा। नन्हे हाथ सिर ढकने लगे, मासूम आंखों में डर तैर गया

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प्रकृति की पुकार

जिज्ञासा सिंह, (पर्यावरण प्रेमी, साहित्यकार एवं ब्लॉगर), लखनऊ आसमान को छू रहा, ऊँचा खड़ा विकास।पशु-पक्षी बेघर हुए, खोजें निज आवास।। प्लॉटिंग के बाज़ार में, बिकते चारागाह।घर-घर छुट्टा जानवर, व्यापारी की वाह।। उमड़-घुमड़ रोती रही, बदली नभ में आज।सर, सरिता और कूप के, बैरी करते राज।। मेढ़क प्यासा ढूँढ़ता, अपना खोया कूप।कंकड़-पत्थर हैं वहाँ, बदल गया…

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