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हटिया जन्माष्टमी पूजा समिति द्वारा भव्य काव्य महोत्सव

हटिया जन्माष्टमी पूजा समिति की ओर से हटिया रेलवे कॉलोनी स्थित डीआरएम ऑफिस के सामने बने पूजा पंडाल में छह दिवसीय श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है। इसी क्रम में समिति द्वारा भव्य काव्य महोत्सव का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम अध्यक्ष इंद्रजीत सिंह, सचिव चंदन यादव और वरीय अध्याय अध्यक्ष डॉ. रजनी शर्मा के संयोजन में आयोजित इस कवि सम्मेलन में सभी आमंत्रित अतिथियों को राधे नाम अंगवस्त्र, मोमेंटो एवं पुष्प पौधा प्रदान कर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. रजनी शर्मा ने मधुर स्वर में सरस्वती वंदना से किया। कवि सम्मेलन की अध्यक्षता वरिष्ठ कवयित्री डॉ. सुरिंदर कौर नीलम ने की। उन्होंने अपनी रचना “जब मुरली बजी नटखट श्याम की, राधे-राधे हवाओं में होने लगी” प्रस्तुत कर माहौल को भक्ति रस से सराबोर कर दिया।
इस अवसर पर सदानंद सिंह यादव ने देशभक्ति पर आधारित मुक्तक व सोहर गीत गाए, पुष्पा सहाय गिन्नी ने कृष्ण प्रेम और विरह की भावपूर्ण अभिव्यक्ति की, वहीं सचिन शर्मा ने हवाईन गिटार पर शिव भजन और गीतों से श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर दिया

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टूटना एक डाल का…

जीवन की आंधियाँ जब चलती हैं, तो सिर्फ डालियाँ ही नहीं, कई बार इंसान भी टूट जाते हैं . अपने ही सदाचार और शुभ कर्मों के बोझ से। इस टूटने में भी एक सच्चाई है जैसे परिंदों के घोंसले बिखर जाते हैं, पर वे नई जगह फिर से घर बना लेते हैं। कोयल की तान कहीं खो जाती है, मगर उसकी खोज जारी रहती है। यही जीवन का शाश्वत चक्र है . गिरना, बिखरना और फिर उठना।

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सावन में मायके की यादों में खोई महिला की भावुक तस्वीर

संदेशा मायके का

सावन की फुहारों के बीच मीता की आँखों के सामने मायके की सुनहरी यादें ताजा हो जाती हैं। बिछड़ चुके अपनों की कमी और भाई-भाभी के स्नेह से भरी यह कहानी रिश्तों की गहराई को छूती है।

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यादों की बारिश

बीता हुआ अतीत अक्सर हमारे नयनों के सामने पल भर में जीवित हो जाता है, भूले-बिसरे गीत और बचपन की यादें याद दिलाते हैं। प्रेम, स्मृतियाँ और खोए सपने हमें बार-बार छूते हैं, चाहे हम कितनी भी ताकत जुटाएँ। कुछ यादें इतनी गहरी होती हैं कि उन्हें भुलाया नहीं जा सकता . वे हमेशा हमारे मन और दिल में जीवित रहती हैं।

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गांव में क्या रखा है…

लोग कहते हैं, “गांव में क्या रखा है?”
पर मेरे लिए गांव सिर्फ एक जगह नहीं, मेरे बचपन की थाती है।

वहीं दादी की कहानियां थीं, मां के हाथों से खाया निवाला था, नीम की ठंडी छांव, खेतों की हरियाली और चौपाल की गर्मजोशी थी। कुएं का पानी, पगडंडियों की धूल और पुराने बक्सों में बंद वो मासूम दिन – सब वहीं छूट गए हैं।
गांव की मिट्टी में सिर्फ धूल नहीं, मेरी जड़ें हैं।
जो कहते हैं “गांव में कुछ नहीं रखा,”
शायद उन्होंने कभी गांव को जिया ही नहीं।

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नानी के गाँव में चूल्हे पर रोटी बनाती दादी और नीम की छाँव में खेलते बच्चे

याद आता है पुराना जमाना

यह कविता बचपन की उन सरल और सच्ची यादों को जीवंत करती है, जब नानी का गाँव, चूल्हे की रोटी, नीम की छाँव, पाठशाला के संस्कार और बिजली जाने पर चिमनी की रोशनी जीवन का हिस्सा थे। “याद आता है पुराना जमाना” सिर्फ स्मृतियों का वर्णन नहीं, बल्कि उस सादगी, अपनापन और संस्कारों की दुनिया की भावनात्मक पुनर्स्मृति है, जो आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कहीं पीछे छूट गई है।

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महिला की गरिमा और मानसिक पीड़ा को दर्शाती सशक्त कविता, जिसमें बिना शारीरिक स्पर्श के की गई हिंसक दृष्टि और नजरों के अपराध को शब्दों के माध्यम से उजागर किया गया है.

देह नहीं, आत्मा का अपमान

यह कविता एक स्त्री के उस अनुभव को गद्यात्मक रूप में सामने रखती है, जहां शारीरिक छेड़छाड़ के बिना भी उसकी गरिमा पर हमला किया जाता है. यह रचना बताती है कि किसी की घूरती, गंदी नजरें भी हिंसा का ही रूप होती हैं, जो मन को भीतर तक घायल कर देती हैं. कविता समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि अपराध केवल स्पर्श से नहीं, बल्कि दृष्टि और मानसिक उत्पीड़न से भी होता है, और ऐसी हर सोच व व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है.

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कठपुतलियों के माध्यम से प्रेम और एहसासों को दर्शाती भावनात्मक हिंदी कहानी का दृश्य

धागों से परे

कुछ रिश्ते डोरियों से नहीं, आत्मा के एहसासों से बंधे होते हैं। “धागों से परे” एक ऐसी मार्मिक कहानी है, जिसमें कठपुतलियाँ प्रेम, बिछड़न और मुक्ति का प्रतीक बन जाती हैं।

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मौन रात्रि और स्वप्निल वेदना

अँखियाँ रात भर प्रेमिल स्वप्नों में जागती रहीं और रात भोर की प्रतीक्षा में ठहरी रही। मौन ओढ़े मानिनी-सी पीड़ा सहती रही, मगर अपनी वेदनाएँ किसी से न कह सकी और गरल पीकर भी चुप रही। भावनाओं के पारिजात बिखेरकर, श्वेत वस्त्रों में सजी वह सुरभित यामिनी को पीछे छोड़ चली गई।

श्यामल मेघों से घिरी रात में दीपशिखा मद्धम पड़ गई और अमावस की निस्तब्धता में झरती रही चाँदनी। उसके अंतर्मन की कोमलता ओस की बूँदों-सी पारदर्शी थी। वही मधुरिमा उसकी लेखनी से बही और हृदय के फूलों-सी कोमल पंक्तियों में खिल उठी।

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