महाकाल की नगरी में लोक–आस्था का महासंगम

महाकाल महालोक में भगोरिया नृत्य की प्रस्तुति

आदिवासी परंपराओं में धड़कता शिव का लोकहृदय

सुरेश परिहार, पुणे (महाराष्ट्र)

उज्जैन।
भगवान महाकाल की नगरी इन दिनों केवल दर्शन की नहीं, बल्कि लोक-संस्कृति, आदिवासी परंपराओं और शिव-भक्ति की जीवंत प्रयोगशाला बन गई है। श्री महाकाल महालोक के आंगन में चल रहा पांच दिवसीय महाकाल महोत्सव अब एक सांस्कृतिक आयोजन से आगे बढ़कर आस्था और लोकजीवन के संवाद का रूप ले चुका है। महोत्सव के दूसरे दिन गुरुवार को यह स्पष्ट हो गया कि महाकाल का शिवत्व केवल मंत्रों में नहीं, बल्कि देश की जनजातीय धड़कनों में भी बसता है।

मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग, वीर भारत न्यास और महाकाल मंदिर प्रबंध समिति के संयुक्त आयोजन में दूसरा दिन आदिवासी शिव-अनुभूति के नाम रहा। डिंडोरी से आए अशोक कुमार मार्को और उनके दल ने जब गोंड जनजाति के गुदुमबाजा की थाप छेड़ी, तो वह सिर्फ ताल नहीं थी, बल्कि प्रकृति और पुरुष के मिलन का आदिम उद्घोष था। बैगा जनजाति के दयाराम और साथियों द्वारा प्रस्तुत कर्मा नृत्य ने यह संदेश दिया कि शिव केवल कैलासवासी नहीं, बल्कि जंगल, पर्वत और जनजीवन के देवता भी हैं।

धार से आए मनीष सिसौदिया के दल द्वारा प्रस्तुत

भगोरिया नृत्य ने महालोक को उत्सव में बदल दिया। रंग, ऊर्जा और सामूहिक उल्लास से भरा यह नृत्य बताता है कि शिव की आराधना केवल वैराग्य नहीं, बल्कि जीवन के उत्सव को स्वीकार करने की भी प्रेरणा है। वहीं सागर के मनीष यादव के बरेदी नृत्य ने ग्रामीण संस्कृति की सादगी और शक्ति को मंच पर उतार दिया।

डमरू से लोक तक: कला यात्रा बनी चलती हुई कथा

दोपहर में निकली कला यात्रा महज एक शोभायात्रा नहीं, बल्कि चलती हुई सांस्कृतिक कथा थी। उज्जैन के मुकेश शास्त्री के नेतृत्व में रामघाट से निकली यह यात्रा हरसिद्धि पाल और बड़ा गणेश होते हुए महाकाल महालोक पहुंची। डमरू वादन की गूंज ने यह प्रतीकात्मक संदेश दिया कि शिव की आवाज स्थिर नहीं, वह चलते हुए समाज में निरंतर प्रतिध्वनित होती रहती है।

जब संगीत और रंगों में उतरा शिव

शाम के सत्र में मुंबई की प्रसिद्ध टीम द ग्रेट इंडियन क्वायर ने ‘शिवा’ नामक प्रस्तुति से दर्शकों को एक नए अनुभव से रूबरू कराया। यह सिर्फ संगीत कार्यक्रम नहीं था, बल्कि सुरों और लाइव पेंटिंग के माध्यम से शिव तत्व का दृश्यात्मक ध्यान था। जैसे-जैसे संगीत आगे बढ़ता गया, रंगों में उभरती शिव आकृति ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।

आज महालोक में गूंजेगी सोना महापात्रा की शिव साधना

वीर भारत न्यास के न्यासी सचिव श्रीराम तिवारी के अनुसार, महोत्सव के तीसरे दिन शुक्रवार की शाम सुप्रसिद्ध गायिका सोना महापात्रा की प्रस्तुति आकर्षण का केंद्र होगी। उनकी आवाज में शिव-भक्ति, लोक और समकालीन संगीत का संगम महालोक को एक नए आध्यात्मिक शिखर पर ले जाएगा।

मंच पर आदिवासी भारत की जीवंत झलक

शाम के मंचीय कार्यक्रमों में उपेंद्र सिंह (सीधी) का करमा नृत्य, दयाराम (डिंडोरी) का परधौनी नृत्य, कमलेश नामदेव (गोटगांव) का अहिराई नृत्य और अंकिता (छिंदवाड़ा) का सैताम नृत्य प्रस्तुत किया जाएगा। ये प्रस्तुतियां केवल नृत्य नहीं, बल्कि भारत की जनजातीय स्मृति का उत्सव हैं।

महाकाल महोत्सव यह सिद्ध कर रहा है कि शिव केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि लोक में, लय में और जीवन के उत्सव में बसते हैं। यही इस आयोजन का सबसे बड़ा और अनूठा संदेश है।

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