
डॉ. आशासिंह सिकरवार, प्रसिद्ध लेखिका, अहमदाबाद
इन आँखों में न जाने कितने समंदर बसे हैं,
कि हँसते-हँसते रो पड़ती हैं।
तैरने लगती हैं मछलियाँ,
फिर डरने लगती हैं जाल से।
अतल गहराइयों में चली जाती हैं,
बिछड़ जाती हैं अपने साथी से।
शिकारी नहीं समझता बिछड़ जाने का दुख,
उसे महज़ पकड़ना है बाज़ार की साज़िश के तहत,
और मछलियों को पहुँचाना है धरती के कोनों तक।
न जाने कहाँ-कहाँ मौजूद हैं राक्षस के दाँत,
जो मछली के गर्भगृह को काटकर खाने को तत्पर हैं।
इसी तरह आबाद गति से चलता रहेगा
मछलियों का व्यापार।
नहीं बच पाएगी धरती पर एक भी मछली।
मछली की जिजीविषा अनंतकालीन है,
पर जीवन क्षणभंगुर है।
सभी खरीदकर घर ले आते हैं रंग-बिरंगी मछलियाँ,
कुछ दिन दाना चुगाते हैं वे।
कुछ दिन बहलता रहता है मन उनसे,
फिर निकल पड़ते हैं नई तलाश में।
घर के गंदे पानी में सड़ने लगती हैं मछलियाँ,
वे तड़पने लगती हैं साफ पानी के लिए।
कोई नहीं होता उनके पास
जो देख सके उनका तड़पना।
रात भर मृत्यु और जीवन
के बीच चलता है दमघोंटू खेल,
फिर स्वेच्छा से हो जाती हैं समर्पित।
उनका समर्पण अंधेरे में अनदेखा रह जाता है,
उनके भीतर रखी रहती है एक मृत मछली।
युग दोहराता है…
“मछली जल की रानी है”,
मछलियों को जीवित रहने के लिए स्वच्छ पानी चाहिए,
पर भूल जाते हैं वे पानी स्वच्छ रखना।
उठकर चले जाते हैं वे अनंत दिशाओं में,
इंतज़ार में जिजीविषा दम तोड़ देती है…
Bahut khoob
बहोत मामिर्क रचना
बहुत सुंदर मार्मिक चित्रण