
चन्द्रवती दीक्षित, करनाल (हरियाणा)
प्रातःकाल की भोर की किरणों की लालिमा के संग, वेदांशी सासू माँ को अदरक, तुलसी, सौंफ और इलायची के शुद्ध मिश्रण से बनी चाय देने गई। सासू माँ ने आशीषों की झड़ी लगा दी-“दूधो नहाओ, पूतो फलो।”
वेदांशी ने भी पूरे आत्मसमर्पण से चरण-वंदना की।
तभी वेदांशी को याद आया कि आज लोहड़ी का पावन त्योहार है। वह सासू माँ से बोली—
“अम्मा, आज लोहड़ी का प्यारा त्योहार है। हम पड़ोस में साक्षी जी के घर प्रेम-स्वरूप भेंट देना चाहते हैं और इस शुभ घड़ी को उनके साथ मनाना चाहते हैं।”
इतना सुनते ही सासू जी क्रोधित होकर बोलीं-“उनकी जाति-पाँति का अता-पता नहीं। त्योहार अपनी जाति-धर्म के लोगों के साथ ही मनाए जाते हैं।”
इस पर वेदांशी ने बड़े प्यार से माँ जी को समझाया-“माँ जी, ऐसा कहना उचित नहीं है। मानवता, त्योहार और रिश्ते जाति-धर्म से ऊपर होते हैं। ये तो प्रेम के प्रतीक हैं। आपको याद है, आपके ऑपरेशन के समय जब खून की आवश्यकता पड़ी थी, तब साक्षी की बेटी ने ही अपना खून देकर आपकी जान बचाई थी। उस समय उन्होंने जाति का हवाला नहीं दिया था। हाँ, जो लोग जाति-धर्म के नाम पर नरसंहार करते हैं, वह सरासर गलत है।”इतना सुनते ही सास राधा की आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। उन्होंने बहू को स्नेह से गले लगाया, ईश्वर का धन्यवाद किया और आत्म-संतोष से सराबोर होकर साक्षी के परिवार को दिल से दुआएँ देने लगीं।
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