ज्ञान नहीं, बदलाव लिखिए

खिड़की के पास बैठा लेखक, वैचारिक लेखन में डूबा हुआ दृश्य

आशी प्रतिभा, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

जीवन में केवल ज्ञान बाँटने के लिए नहीं, बल्कि बदलाव के लिए भी लिखना चाहिए। और यह बदलाव सबसे पहले स्वयं से ही प्रारंभ होना चाहिएनवीन रचनाएँ लिखना हमें सृजनात्मक और कलात्मक बनाता है, परंतु जब हम वैचारिक रूप से लिखते हैं, तब जीवन हमें अधिक स्पष्ट रूप से समझ में आने लगता है। कई बार हम कुछ बातों को मूलतः मना नहीं कर पाते या सीधे “न” नहीं कह पाते, परंतु उसका प्रभाव किसी न किसी रूप में अंततः हम पर ही पड़ता है। जिस कार्य को हम पूरी निष्ठा और क्षमता से नहीं कर सकते, उसे केवल दूसरों को दिखाने के लिए नहीं करना चाहिए। कहने का आशय यह है कि हमें किसी और के लिए नहीं, बल्कि अपने स्वयं के दृष्टिकोण को सटीक रखते हुए, अपने भीतर सुधार लाने के लिए लिखना चाहिए।

कई लोग सामाजिक भेदभाव जैसे विषयों पर लिखते हैं, परंतु प्रश्न यह है कि क्या वे स्वयं उस भेदभाव से मुक्त हैं? यदि नहीं, तो सबसे पहले हमें अपने भीतर से ही इस भेदभाव को मिटाना होगा। तभी हम सामाजिक स्तर पर यह कहने का नैतिक अधिकार रख पाएँगे कि हम भेदभाव नहीं करते। आज कुछ सामाजिक विषय ऐसे हैं, जहाँ सामाजिक समरसता की जगह जाति-आधारित परिवर्तन और भेदभाव ने कट्टर रूप ले लिया है, जो मानवीय भावनाओं के लिए अत्यंत दुखद है।

एक आम व्यक्ति के जीवन में सबसे पहले उसकी आजीविका आती है। जाति और समाज से पहले उसका कर्म ही उसे जीवन जीने की शक्ति देता है। किसी भी धर्म या जाति से संबंधित होने के बावजूद, मनुष्य को अपने व्यवसाय और अपने कर्म पर ही निर्भर रहना पड़ता है। रोटी, कपड़ा और मकान मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकताएँ हैं।

जब हम धर्म की बात करते हैं, तो सनातन धर्म के अनुसार भी मानवता ही मनुष्य जाति के लिए सबसे बड़ा धर्म है।

आज हमें राम के पदचिन्हों पर चलने की आवश्यकता है, क्योंकि वे आदर्श हैं। परंतु इस समाज में टिके रहने और परिस्थितियों का सामना करने के लिए हमें कृष्ण बनना भी सीखना होगा। यह एक सतत यात्रा है. राम हमें आदर्श सिखाते हैं, और जीवन के उतार-चढ़ाव में कृष्ण की भाँति हर परिस्थिति को संभालने की शक्ति प्रदान करते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *