कुछ रंग ऐसे भी…

कुछ रंग ऐसे भी… | रिश्तों, धोखे और ख़ामोशी पर विचारशील कविता

पूनम सिंह, प्रसिद्ध लेखिका

ज़िंदगी के कोरे कैनवास पर
ब्रश की तरह मिले लोगों ने
अपने धोखे और रंग बदलने की फ़ितरत के रंग
कुछ ऐसे सलीके से बिखेरे हैं
कि उस कोरे कैनवास का
कोना-कोना
उन्हीं के रंग में रंग गया है।
हाँ, कहीं खो गए हैं
ज़िंदगी की आत्मा के स्वाभाविक
प्रेम और अपनेपन के रंग,
उन्हीं रंगों की भीड़ में।
मानो
हम अपना अस्तित्व ही
भूल बैठे हों।
प्रेम का रंग
जैसे बदरंग हो गया है।
अब रंगों से
प्रेम और सौहार्द की
भीनी ख़ुशबू नहीं आती,
बल्कि बासीपन की
एक अजीब-सी बू
महसूस होती है।
मानो
प्रेम और अपनेपन के रंग
बाक़ी रंगों में
घुलकर एकाकार हो गए हों।
उभरकर आया है तो
बस एक ही रंग
हाँ…
वो रंग जो
उदासी से लिपटा
ख़ामोशी का रंग है।
जो स्याह है,
अंधकार-सदृश…
और ख़ामोश है
किसी पहाड़ की तरह।

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