
सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज
वास्तव में, जब हम अपनी खुशियों की डोर दूसरों के हाथों में थमा देते हैं, तब टूटना तय हो जाता है. क्योंकि जहाँ नियंत्रण हमारे हाथ से निकलता है, वहीं असुरक्षा जन्म ले लेती है. इंसान अक्सर यह भूल जाता है कि उसे दूसरों को परखने से पहले स्वयं को समझना और जाँचना चाहिए. अपने भीतर झाँकने का साहस बहुत कम लोग करते हैं, जबकि वही सबसे ईमानदार आईना होता है. लोगों का स्वभाव भी विचित्र है. वे अक्सर हमारी ज़िंदगी में हमारी खुशी के लिए नहीं, बल्कि अपनी खुशी की तलाश में आते हैं. यह समझना बेहद ज़रूरी है कि कोई आपके पास आपकी ज़रूरत से आ रहा है या अपनी ज़रूरत लेकर. जो व्यक्ति अपनी खुशी चाहता है, वह आपकी मजबूरी में नहीं, बल्कि अपनी आवश्यकता के समय आपके पास आता है. और कई बार वह अपनी इच्छाओं को इस तरह पेश करता है जैसे वही आपकी चाह हो. यहीं इंसान भ्रम में पड़ जाता है. मीठी-मीठी बातें, सजी हुई ताऱीफें और अपनापन जताने वाले शब्द मन को भाते ज़रूर हैं. उनका आनंद लेना कोई अपराध नहीं, लेकिन उन्हें अपनी आदत बना लेना खुद से बेईमानी है. क्योंकि जब वे शब्द अचानक खामोश हो जाते हैं, तब मन सबसे ज़्यादा टूटता है.
जो आज पास है, वही कल दूर भी हो सकता हैयह सत्य जितना जल्दी स्वीकार कर लिया जाए, उतना ही मन हल्का रहता है.
असल खुशी बाहर नहीं, भीतर जन्म लेती है. अपने लिए खुशी पैदा करना सीखिएऐसी खुशी जो न किसी की प्रशंसा की मोहताज हो, न किसी के पुरस्कार की.
जब भीतर की खुशी जाग जाती है, तब न कोई कड़वी बात ज़्यादा चुभती है, न कोई उपेक्षा आपको तोड़ पाती है. तब आप दूसरों के व्यवहार से नहीं, अपनी समझ से संचालित होते हैं. खुशियाँ सच में दो तरह की होती हैंबाहरी और आंतरिक. बाहरी खुशी ताली की आवाज़ में, ताऱीफ की चमक में और पुरस्कार की चमक-दमक में मिलती है, लेकिन यह क्षणिक होती है. इसके पीछे हमेशा एक डर छुपा रहता हैअगर कल यह न मिला तो? वहीं आंतरिक खुशी शांत होती है, स्थिर होती है. वह किसी के होने या न होने से नहीं बदलती. वह आत्मस्वीकृति से जन्म लेती है.
जो व्यक्ति भीतर से खुश होना सीख लेता है, उसे दुनिया की बेरुख़ी डरा नहीं पाती. क्योंकि तब उसकी खुशी किसी और के व्यवहार पर निर्भर नहीं रहती, बल्कि उसके अपने अस्तित्व से निकलती है. और यही सबसे सच्ची, सबसे मजबूत और सबसे मानवीय खुशी है.