कविताएँ मेरी हथेली पर

सुरभि ताम्रकार, लेखिका, दुर्ग

कविताएँ मेरी हथेली पर
मेहंदी-सी रचने लगी हैं
आजकल।

इनके शीर्षक ही
मेरे प्रिय का नाम हैं।

जैसे
इन्हें मैंने
ख़ुद की तरह अपनाया है
इनमें सुगंध है
अपनेपन की।

रंग हल्की लालिमा-सा,
जैसे
सूरज शब्द बन
हथेली पर उतर आया हो।

इनकी सुहागन होने के क्रम में
मैं संपूर्ण हो चुकी हूँ।

मेरे हाथ,
मेरे अंतर्मन को
अब कविता से स्पर्श करते हैं।

माँ पर लिखी कविता
मेरी हृदय रेखा है।
पिता पर लिखी कविता
मेरी भाग्य रेखा।

प्रेम पर लिखी कविता
मस्तिष्क रेखा-सी लगती है,
और समाज पर लिखी कविता
मेरी जीवन रेखा-सी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *