
सुरभि ताम्रकार, प्रसिद्ध लेखिका, दुर्ग
कविताएं तुम मेरे हिस्से क्यों होती जा रही
समाज का एक तबका इसे विद्रोह मान बैठा है।
पर तुम-तुम अंकुरित होती हो
बलात्कार, घरेलू हिंसा, नारीवाद, पुरुषवाद
और प्रकृति के फूल बनकर
मेरे अंतर्मन के गर्भ से जन्म लेती हो,
मेरे प्रसवकाल के बाद, बाहर आती हो।
तुम्हारा रुदन, तुम्हारा स्नेह,
कभी मुझे तुमसे दूर नहीं कर पाता।
कहते हैं,
एक स्त्री इतनी बेबाक नहीं हो सकती,
इतनी तार्किक, इतनी स्वतन्त्र,
इतनी जिज्ञासु अपनी निजी दुनिया में।
लोग कहते हैं
“तुम्हारी चिंगारी, मेरे हृदय से ज्यादा
मेरा प्रेम झुलसा देगी।”
पर मैं जानता हूँ, ये विचारों का मोह
मुझे मेरे विवाह से दूर नहीं कर सकता।
तुम्हारे मोक्ष की चाह,
और जीवन संगिनी बन जाने की आकांक्षा,
कभी मेरी चंचलता को दबा नहीं सकती।
फिर भी मैं कैसे भूल जाऊँ तुम्हें,
जब ये सुखद विद्रोह मुझे
मुझसा रहने देता है?
समाज खुद से लड़े, मुझे नहीं।
अब मैं अपना सबकुछ त्याग नहीं सकती,
क्योंकि ये विचार उनकी देन थे।
और तुम मेरी हो चुकी
ये हमारे विधाता की नियति।
मुझे आशंका भी नहीं कि कभी विरह होगा।
तुम भयभीत नहीं होती, यही मेरा विश्वास है।
ओह, मेरी प्यारी कविताएं,
तुम मेरी साँसों का हिस्सा हो।
और बताओ
कब तक समाज मेरी साँसों को दरकिनार करेगा?
बहुत सुन्दर लिखा आपने, स्वागत