
वंशिका परसरामपुरिया, नवोदित लेखिका, मुंबई
मुस्कुराओ तो दिन संवर जाए,
उदास रहो तो दिन ढल जाए।
हरकतें भी अजीब लगें,
पर आपके बिना गुजारा भी न हो पाए।
बातें रहें अनकही-सी,
आंखें कुछ कहें आपकी।
रहे थोड़ी कश्मकश,
रहे थोड़ी-सी हिचकिचाहट,
बस दिल न भरे कभी बातों से आपकी।
कभी दिल सोचे,
यार, कैसा इंसान है ये।
गुस्सा भी आए,
लेकिन दिल भी पिघल जाए।
कभी तो सोचूं बदल जाओ आप,
पर हृदय यह कहे — नहीं यार, ऐसे ही रहना सदा आप।
रहना बहुत खुश,
रहना बहुत सुखी,
बस ऐसे ही रहना आप।
वंशिका परसरामपुरिया की एक ओर कविता ‘आशियाना’ यहां पढ़िए
अच्छा प्रयास।