आईपीएस अधिकारी की खामोश जंग, जिसने उम्मीद की लौ जलाए रखी
कुछ कहानियां शोर नहीं मचातीं. वे अखबारों की सुर्खियों में चमकने से पहले किसी मां की आंखों के आंसुओं में जन्म लेती हैं, किसी पिता की टूटी हुई उम्मीदों में सांस लेती हैं और किसी बच्चे के खोए हुए बचपन में सिसकती रहती हैं. आईपीएस अधिकारी मल्लिका बनर्जी की कहानी भी ऐसी ही है. यह साहस की नहीं, संवेदना की कहानी है. यह वर्दी की ताकत की नहीं, इंसानियत की जिद की कहानी है.
वर्ष 2016 में छत्तीसगढ़ में तैनाती के दौरान मल्लिका बनर्जी के सामने एक ऐसा सच बार-बार आ रहा था, जिसे आंकड़ों और फाइलों में कैद नहीं किया जा सकता था. गांवों से बच्चे “नौकरी” के नाम पर जाते थे और फिर कभी लौटकर नहीं आते थे. मां-बाप थानों के चक्कर लगाते, शिकायतें डर और दबाव में दम तोड़ देतीं और सिस्टम खामोश रह जाता. मल्लिका ने समझ लिया कि अगर वर्दी में सच नहीं दिख रहा, तो शायद बिना वर्दी के दिखेगा.
उन्होंने अपना पद, अपनी सुरक्षा और अपनी पहचान एक तरफ रख दी. एक साधारण सेल्सवुमन बनकर वे गांव-गांव गईं. न कोई हथियार, न कोई एस्कॉर्ट, बस एक संवेदनशील मन और सतर्क आंखें. वे लोगों से सवाल नहीं करती थीं, उनकी तकलीफ सुनती थीं. धीरे-धीरे भरोसा बना और उसी भरोसे ने तस्करी के उस जाल को उजागर किया, जो नौकरी एजेंसियों के नाम पर बच्चों की ज़िंदगियां निगल रहा था. बेहतर भविष्य के सपने, जबरन मजदूरी और शोषण के अंधेरे में बदल दिए जाते थे.
इस खामोश जांच का नतीजा था करीब 25 अवैध प्लेसमेंट एजेंसियों का भंडाफोड़ और 20 से अधिक बच्चों की घर वापसी. वे बच्चे, जिनकी आंखों में डर था, जिनकी हंसी कहीं खो गई थी, फिर से अपने परिवारों की बाहों में लौटे. उस दिन कोई जश्न नहीं मनाया गया, लेकिन कई घरों में वर्षों बाद चूल्हे जले और दुआएं उठीं.
मल्लिका बनर्जी को “रियल लाइफ मर्दानी” कहा जाता है, लेकिन उनकी कहानी किसी फिल्म की तरह तालियां नहीं बटोरती. यह कहानी बेचैन करती है. यह दिखाती है कि अपराध हमेशा डरावने चेहरे लेकर नहीं आता. वह अक्सर भरोसे की शक्ल में आता है. पड़ोसी बनकर, परिचित बनकर, उम्मीद बनकर आता है और गरीबी उसकी सबसे बड़ी ताकत बन जाती है.
आज, जब देश के अलग-अलग हिस्सों से बच्चों की तस्करी के नए मामले सामने आ रहे हैं, गुजरात से झारखंड और कोलकाता तक, तब मल्लिका बनर्जी की यह कहानी एक चेतावनी भी है और एक उम्मीद भी. चेतावनी इसलिए कि यह संकट अभी खत्म नहीं हुआ. और उम्मीद इसलिए कि अगर संवेदना के साथ साहस जुड़ जाए, तो सिस्टम भी जिंदगियां बचा सकता है.
यह कहानी हमें याद दिलाती है कि असली बहादुरी शोर में नहीं होती. वह चुपचाप किसी मां के सूने आंगन में रोशनी बनकर लौटती है. और वही रोशनी किसी देश का भविष्य बचा लेती है.