हॉफ टिकट : यादों का स़फर

यह लेख पुराने जमाने की रेलवे टिकटिंग, हॉफ टिकट और टिकट कलेक्शन के अनुभवों को यादगार अंदाज में पेश करता है। यात्रा और रेलवे से जुड़ी यादें, nostalgically बयान की गई हैं।

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज

पहले के जमाने में रेलवे टिकटिंग आज जैसी डिजिटल नहीं थी. यूटीएस टिकट सिस्टम या मोबाइल एप का कोई अस्तित्व नहीं था, न ही बुकिंग विंडो पर कम्प्यूटर हुआ करता था.बस एक साधारण मशीन होती थी, जिस पर कार्डबोर्ड की टिकट पर तारीख एम्ब्रोज की जाती थी. टिकट प्रिंट करते समय यह मशीन इतनी तेज़ आवाज करती थी कि वेटिंग हॉल में बैठे व्यक्ति को पता चल जाता था कि बुकिंग शुरू हो गई है. यदि किसी को आवाज़ सुनाई नहीं भी देती थी, तो मुलकराज बाबूजी जोर से बुकिंग शुरू का ऐलान कर देते थे.
बुकिंग विंडो के अंदर कार्डबोर्ड की ये टिकटें अच्छी तरह से जमी रहती थीं, अलग-अलग अप और डाउन लाइन के लिए.
टिकटों की अलमारी में इन्हें सीरियल नंबर के अनुसार जमा किया जाता था, और हर टिकट पर स्टेशन का कोड और किराया भी लिखा रहता था. इसके नीचे किराया लिखा होता और आधी टिकट पर चाइल्ड लिखा रहता था. टिकट खरीदने वाला जब डेढ़ टिकट बोलता, तो इसका मतलब होता एक पूरी टिकट और एक आधी. कभी-कभी दो बच्चों की मिलाकर एक पूरी टिकट भी ली जाती थी, जिसे टीसी भी मान लेते थे. गांव छोटा होने के कारण रेलवे कर्मचारी भी सभी लोगों से घुले मिले रहते थे. बाहर भीड़ होने के कारण लोग लाइन में खड़े होने के बजाया डायरेक्ट अंदर बुकिंग ऑफिस में जाकर टिकट ले लिया करते थे. इसे बड़ी शान की बात समझा जाता था. यह रिश्तेदारों और अन्य यात्रियों पर रौब झाड़ने का एक तरीका भी होता था. इससे कभी-कभी परेशान होकर कर्मचारी बाहर निकलने के लिए झिड़क भी देते थे.
रेल यात्रा समाप्ति पर टिकट कलेक्टर द्वारा टिकट इकट्ठा की जाती थी, जो आजकल अधिकांश स्टेशनों पर देखने को नहीं मिलती. कभी-कभी हम खुद भी टीसी या रेलवे कर्मचारी बनकर टिकट इकट्ठा करने का खेल खेला करते थे. लोग खुशी-खुशी अपने जेब से टिकट निकालकर हमें दे देते थे. यह अनुभव एक रेल कर्मचारी होने का सुखद अहसास देता था. कई बार लोग नागदा से देहरादून जाने वाली 19 डाउन एक्सप्रेस के टिकट कलेक्ट करके उसका उपयोग शाम को पार्सल में भी कर लेते थे. हालांकि ऐसा करने वाले कम ही थे, क्योंकि उस जमाने में नागदा किराया सिर्फ 55 पैसे था. उस समय महिदपुर रोड स्टेशन पर केवल जनता एक्सप्रेस, मथुरा-बड़ौदा लोकल, देहरादून एक्सप्रेस और कोटा-बड़ौदा पार्सल का स्टॉपेज था. रिजर्वेशन टिकट भी कार्डबोर्ड के ही मिलते थे.रिजर्वेशन टिकट पर पेन से कोच नंबर और सीट नंबर लिख दिए जाते, और उसका बकायदा रजिस्टर बनता था. इसके बाद चार्ट तैयार करके टीटीई को दिया जाता, ताकि कोच में सही सीटिंग सुनिश्चित हो सके.

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