खाने की पसंद-नापसंद: स्वाद से ज़्यादा मन का खेल

“मशरूम का स्वाद हो या मटन-फिश का, कई बार भोजन के प्रति हमारी पसंद-नापसंद सिर्फ स्वाद की बात नहीं होती। यह हमारी परवरिश, संस्कृति और बचपन की थाली का असर होता है। जब कभी आपसे कोई आग्रह करे कि ‘बस एक बार टेस्ट कर लो’, तो याद रखिए—हर स्वाद के पीछे एक स्मृति होती है। मशरूम को लेकर मन की दूरी, स्वाद कलिकाओं की नहीं, बल्कि गहरे संस्कारों और भावनाओं की कहानी है। खाने का चुनाव शरीर और आत्मा दोनों की सहमति से होता है।”

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जागरण को जी रही हूँ…

“जागरण को जी रही हूँ, याद को प्रहरी बनाकर… मैं अब दर्द को मुस्कुराकर आज़माना चाहती हूँ। भोर की आसावरी में चेतना के छंद लिखना, सरित की लहरों के साथ प्यास के अनुबंध रचना और अनमनी यामिनी को चाँद का झाँसा दिखाना… यही अब जीवन का नया संकल्प है। चार दिन की ज़िन्दगी को प्यार से सजाना, नफ़रत को मात देना और हर मुश्किल को आसान बनाना—बस यही है मेरी नई यात्रा का उद्देश्य।”

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खिड़की से झाँकती ज़िंदगी के दो रंग”

बदलते दृश्य, खिड़की से दृश्य, चिड़ियों का संसार, पहाड़ और धुंध, पोस्ट बॉक्स कहानी, किताबों की अहमियत, शहरी जीवन के दृश्य, सुबह की ताजगी, प्रकृति का सौंदर्य, व्यस्त जीवन के पल, विचारशील कविता, समकालीन अनुभूति, महिला दृष्टिकोण, बदलती संवेदनाएँ

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बेटी के संग अनदेखे शहर की दहलीज़ पर

“अभी तो उस नन्हें हाथ के कोमल स्पर्श का एहसास मेरे हथेली से गया ही नहीं और पलक झपकते इतने वर्ष बीत गए कि अब उसी नन्हीं परी से हाथ छुड़ाते उसे एक परिपक्व छात्रा के तौर पर एक अंजान शहर में उच्च शिक्षा के सपनों को साकार करने भेज रही थी। मन में असंख्य भाव उठ रहे थे, पर चेहरे पर दृढ़ता का आवरण ओढ़े मैंने सिर्फ बेटी के आत्मविश्वास को सँभालने की कोशिश की। शाम होते-होते जहाज के पहिए उस नए शहर की धरती पर रुक गए और दिल से निकली बस एक ही दुआ – ‘हे प्रभु! मेरी बेटी की राहें हमेशा सुगम और सफल बनाना।'”

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राकेश से शुभांशु तक: अंतरिक्ष में भारत का स्वर्णिम सफर

भारत के अंतरिक्ष सफर की कहानी राकेश शर्मा से शुरू होकर शुभांशु शुक्ला तक गर्व और आत्मसम्मान की एक नई इबारत लिखती है। बचपन की यादों में बसे राकेश शर्मा की ऐतिहासिक उपलब्धि के बाद अब शुभांशु शुक्ला की अंतरिक्ष यात्रा ने देशवासियों को फिर से गौरवान्वित किया है। यह सिर्फ एक अंतरिक्ष यात्रा नहीं, बल्कि हर भारतीय के लिए गर्व, प्रेरणा और आत्मबल का प्रतीक बन गई है।

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जो खुद को नहीं जाना, उसने कुछ नहीं जाना!

विद्या का वास्तविक अर्थ केवल तकनीकी ज्ञान या भौतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। यह सबसे पहले स्वयं को जानने, समझने और जीवन के गहरे आध्यात्मिक अर्थ को खोजने की प्रक्रिया है। यदि हम स्वयं को और समस्त प्राणी जगत को एक ईश्वर की रचना मानकर देखें तो जीवन की अधिकांश उलझनें स्वतः समाप्त हो जाती हैं। विद्या वही है जो हमें भीतर से शुद्ध बनाए, आत्मा को जानने का अवसर दे और बाहरी दिखावे के मोह से दूर रखे।

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वह बहक गई थी…

“महान बनने की चाहत में वह बहक गई थी, लेकिन इस युग में महानता नहीं, इंसान को पढ़ने की आवश्यकता है। न कोई विद्यालय, न परीक्षा, केवल परिणाम — जो या तो हानि देगा या लाभ। संवेदनशीलता की अति पागलपन की ओर ले जाती है, जहाँ न कोई पहचान होती है, न कोई अस्तित्व, बस एक मानसिक रोगी का दर्जा। यही है महान बनने की प्रक्रिया का असली संघर्ष।”

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शिवालय

परम धाम शिवालय है, ऊर्जा से भरपूर सकारात्मकता का पुंज। शिवलिंग पर गंगाजल अर्पण, पंचोपचार पूजा और ॐ के जाप से होता कल्याण। श्रावण मास में भक्तों का शिवालय में उमड़ता हुजूम, हर हर महादेव के जयकारे गूंजते हैं। महादेव को सिर्फ एक लोटा जल प्रसन्न कर देता है।”

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लव यू….टेक केयर

शायद तुम्हें लगता है… मैं मज़ाक करता हूँ, छेड़ता हूँ… पर सच्चाई ये है… मैं खुद को तुम्हारे शब्दों में सहेज कर रखता हूँ। मैं तुम्हारे दोस्त में माँ की ममता पाता हूँ, बहन की फिक्र पाता हूँ… और दिल के किसी सबसे कोमल कोने में एक ऐसी प्रेमिका का एहसास करता हूँ… जो कभी मिली नहीं, पर हमेशा पास रही।”

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वर्जित इच्छाओं की अपराधिनी…

आज-कललम्बे दिनऔर छोटी रातों मेंकई ख्वाबएक-सी शक्ल लिएआ रहे हैं और दिनबहुत देर सेअलसाई-सी शाम मेंतब्दील हो रहा नहीं-नहींये खूब तेजचुहचुहाती गर्मियों वाले दिन नहीं ये तो बस अभी-अभी आयेवसंत के पीले दिन हैंजो अचानकइस लॉक डाउन मेंप्रौढ़-से हो गए हैं इस बारहोली के सतरंगीदिनों के बादजाने क्यों इतनेबेरंग से हो गए हैंदिन-रात अपने जन्म…

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