गुरु की छाया में गढ़ता जीवन

शिक्षक जीवन के आधार स्तंभ होते हैं। जैसे कुम्हार कच्ची मिट्टी को चाक पर घुमाकर नया आकार देता है, वैसे ही शिक्षक बच्चों के कोमल और अबोध मन को गढ़ते हैं। बचपन में माता-पिता से बोलना, चलना और सहारा लेना सीखा जाता है, लेकिन जब शिक्षा के मंदिर में पहला कदम रखा जाता है, तब बच्चा पहली बार माता-पिता का हाथ छोड़कर एक नए वातावरण में प्रवेश करता है।

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संस्कृत भाषा और संस्कृत पत्रिका

एक दिन कुछ बच्चों के बीच बैठी मैं पत्रिकाओं की और उसे पढ़ने की बात कर रही थी। उसी क्रम में मैंने उनसे संस्कृत पत्रिकाओं के बारे में पूछा तो वे हँस पड़े। बोले – “संस्कृत तो यूँ भी डेड भाषा है आंटी! उसकी पत्रिका कैसे निकल सकती है? और कौन पढ़ेगा?”

शायद वे सही कह रहे थे।
आज जब बोलियाँ समय के बहाव में सिर्फ एक भाषा अंग्रेज़ी और शहरीकरण के कारण मर रही हैं, तो वर्षों पहले की संस्कृत पत्रिकाओं को ये बच्चे कैसे जान सकते हैं? कैसे जान सकते हैं कि महर्षि पाणिनि की रची यह भाषा कई भाषाओं की जननी है, जिसे दशम मंडलों की भाषा कहा जाता है, वैदिक भाषा कहा जाता है और जिसे हम देववाणी कहते हैं।

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 समानता का दावा 

हमारे समाज में बराबरी का दावा तो बहुत किया जाता है, मगर हकीकत कुछ और ही है। एक ओर बेटों की चाह में बेटियों को गर्भ में ही मार दिया जाता है, तो दूसरी ओर दहेज के लिए उन्हें जलाया जाता है। बलात्कारियों को बचाने की कोशिश की जाती है, जबकि पीड़िताओं से कठोर सवाल पूछे जाते हैं।

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चरित्रहीन

जानकी ने चारपाई का सहारा लिया, पर पाँव डगमगा गए। गले में फाँस-सी अटकी थी, आँखें सूखी होकर भी जल रही थीं। सफ़ाई देने को शब्द नहीं थे, और सुनने वाला भी कौन था? घर की चौखट लाँघते ही उसके कदम रात के सन्नाटे को चीरती ट्रेन की चीख में खो गए—आज उस चीख में शामिल थी एक और चीख।

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त्याग, संघर्ष और चिरनिद्रा

पिताजी चौबीसों घंटे की चौकीदारी करते रहे। दिन-रात की दोहरी ड्यूटी, बस कुछ घंटों की अधूरी नींद और एक छोटे से केबिन में सिमटी ज़िंदगी—यही उनका संसार था। मैंने जब जाना कि बाबूजी महीनों तक मुश्किल से दो-तीन घंटे ही सो पाते हैं, तो मेरा दिल काँप उठा। इतना बड़ा त्याग उन्होंने सिर्फ़ इसीलिए किया कि मैं पढ़-लिख सकूँ और परिवार संभल सके। उनके संघर्ष को याद कर आज भी लगता है—किसी इंसान की मजबूती और प्यार का सबसे सच्चा रूप शायद पिता ही होते हैं।

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चिंता छोड़, सार्थक चिंतन की ओर

“चिंता सचमुच चिता समान है। जीवन की अनहोनी को रोका नहीं जा सकता, पर छोटी-बड़ी चिंताओं से कैसे निपटना है, यह हमारे हाथ में है। मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र और शत्रु उसका मन ही है—इंद्रियों के मोह में फँसा तो बंधन, और निर्विकार रहा तो मुक्ति। आँखें, कान, हृदय और मस्तिष्क—ये सब मिलकर हमारी चिंताओं का जाल बुनते हैं। गीता हमें सिखाती है कि सकारात्मक चिंतन और समदृष्टि अपनाकर ही मनुष्य चिंता से चिंतन की ओर बढ़ सकता है। मन का घर तभी स्वस्थ है जब उसमें प्रेम और संतुलन हो।”

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उफनते दरिया, टूटते पहाड़ : क़ुदरत से छेड़खानी का परिणाम

पहाड़ों पर ऐसी तबाही पहले कभी नहीं देखी गई। मानसून का इंतजार कर रहे इलाकों में अब प्रलय का मंजर है। उफनती नदियों ने अपनी हुंकार से पहाड़ों को रेत की तरह तोड़ डाला है। चट्टानें दरक रही हैं, रास्ते धंस रहे हैं और जगह-जगह भूस्खलन हो रहा है। नदी-नालों का जलस्तर बढ़ने से धरती जलमग्न होती जा रही है और पानी का तांडव जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर रहा है।

मैदानों में भी हालात कम भयावह नहीं हैं। सड़के सैलाब में तब्दील हो रही हैं, लोग अपने घरों से विस्थापित हो रहे हैं और बेबस होकर जान बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। हर ओर त्राहि-त्राहि मची है।

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मैं नारी हूँ पर अबला नहीं

मैं नारी हूँ, पर अबला नहीं। मेरे आँसुओं में कमजोरी नहीं है, बल्कि वह आग है जो सबको झुलसा सकती है। नारी ईश्वर की अनुपम रचना है। वह घर-आँगन और खेत-खलिहान में गीतों की तरह झूमती है। ममता की गागर और जीवन की धारा उसकी आत्मा में प्रवाहित हैं। वह सृजन की मिट्टी से गढ़ी गई और करुणा से सींची गई है।

फिर भी, कभी उसे भोग्या बना दिया गया, कभी जायदाद समझा गया, और कभी बंधनों में बाँध दिया गया। लेकिन वही नारी मातृशक्ति बनी, महिषासुर का वध किया और अपने परिवार की रक्षा करती रही। अब वह निर्भीक होकर खड़ी है, अन्याय से डरती नहीं और चुनौतियों का सामना करते हुए अपने अस्तित्व को आज़ाद कराती है। स्वतंत्र देश की स्वतंत्र नारी नवयुग का स्वर्णिम आगाज़ है।

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रिश्तों को तह करती औरत

औरत हर दिन अपने रिश्तों को ऐसे तह करती है जैसे बिस्तर पर फैले कपड़े। शिकायतों की सलवटें मोड़कर छुपा देती है, बेरुख़ी को मुस्कान के पल्लू में ढँक लेती है। आँसुओं में धोकर, सहनशीलता की धूप में सुखाए इन रिश्तों को वह अपनी आत्मा के धागों से सीती रहती है। कुछ रिश्ते पुराने कुरतों जैसे ढीले हो चुके हैं, कुछ दुपट्टों जैसे बार-बार फिसलते हैं—फिर भी वह संभालती जाती है। लेकिन रात के सन्नाटे में उसके मन में एक सवाल उभरता है—क्या कभी कोई उसे भी इसी तरह तह करके सँभाले रखता होगा, या वह खुद ही वह अलमारी है, जिसमें सब रखा जाता है, पर कोई कभी खोलकर नहीं देखता।

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गौशाला से अस्पताल तक: सेवा ही जीवन

सालों की नौकरी के बाद जब जोशी जी ने रिटायरमेंट ली, तो सोचा था अब परिवार संग सुखमय समय बिताएँगे। लेकिन हकीकत कुछ और थी—अकेलापन और खालीपन ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया। तभी जीवन ने नया मोड़ दिया। पहले गौशाला की सेवा, फिर अस्पताल में मैनेजर की जिम्मेदारी… और यहीं से शुरू हुई उनकी दूसरी पारी। आज वे सम्मान और आत्मविश्वास के साथ जी रहे हैं, यह साबित करते हुए कि “रिटायरमेंट अंत नहीं, बल्कि नई सुबह की शुरुआत है।”

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