बप्पा की डायरी

ग्यारह दिनों तक मेरे भक्त मेरे दर्शन को तरसते रहे और मैं उनके प्रेम से अभिभूत था। परंतु विसर्जन के दिन जब बारह घंटों तक जल में खड़ा रहा, तब मैंने सच्चाई देखी।
मंडपों में लोग धक्का-मुक्की कर रहे थे, बहसबाजी कर रहे थे, आगे बढ़ने के लिए एक-दूसरे को गिरा रहे थे। सेवक भी अपना रोब दिखा रहे थे।
मैंने सोचा—पंडाल में नहीं तो क्यों न खुले आसमान और समुद्र की लहरों के बीच सबको समान रूप से दर्शन दूँ। वहाँ न कोई कतार, न कोई वीआईपी, न कोई भेदभाव। लेकिन… मेरे भक्तों ने वहीं भी मुझे याद दिला दिया कि इंसान ने भगवान को भी अपने बनाए हुए अमीर-गरीब और ऊँच-नीच के नियमों में बाँध दिया है।

मैं तो वही एकदंत गजानन हूँ—चाहे लालबाग में विराजमान रहूँ या किसी छोटे पंडाल में, या फिर गिरगांव चौपाटी की लहरों में।मेरे लिए सिर्फ एक ही चीज़ महत्वपूर्ण है—मन से की गई भक्ति। बाकी सब इंसानी दिखावा है।”**

Read More

इंतज़ार करता आँगन

चार बेटे होने के बावजूद, उस बुज़ुर्ग दंपत्ति को जीवन के अंतिम पड़ाव पर अकेलापन ही नसीब हुआ। सबने अपना-अपना जीवन चुन लिया, लेकिन अपने पीछे छोड़ गए वे माँ-बाप, जिनकी आँखें अब भी दरवाज़े की ओर टिकी रहती हैं। दादा-दादी अब पोतों की कहानियों और संस्कारों की बातें नहीं कर सकते, क्योंकि वे अब आसपास ही नहीं हैं।

घर की चिंता, इज़्ज़त और नाम की रक्षा अब किसे करनी है — ये सवाल दीवारों से टकराकर लौट आते हैं। माँ-बाप अब खुद को विरह की आग में झोंकने को तैयार हैं, क्योंकि बेटा अब बड़ा हो चुका है, पढ़-लिखकर देश से दूर जा चुका है, अपनी ज़िंदगी बनाने।

Read More

“मौन दरिया, बोलती रात”

यह कविता एक गहरे आत्ममंथन का चित्रण है, जिसमें कवि अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने की जद्दोजहद से गुजर रहा है। वह सोचता है कि आखिर क्या कहे, किससे कहे और कितना कहे, क्योंकि कहने की भाषा तक मौन हो चुकी है। जीवन में ऐसा सन्नाटा है जहाँ शरीर के अंग सुन्न पड़ चुके हैं और चारों ओर उदासीनता छाई है। कवि प्रश्न उठाता है कि किसके पास कितना “पानी” बचा है और किसे उसकी परवाह है। हर कोई अपनी ही धुन में, अपने ही राग में व्यस्त है। जीवन बस एक बहती हुई धारा की तरह है, जो मौन रहते हुए भी अपनी कहानी कहती जाती है।
दरिया का सन्नाटा भी मानो संदेश देता है कि कहीं ठहरना मत, आगे बढ़ते रहना। इस अंतर्द्वंद्व में कवि सोचता है कि दरिया से भी आखिर क्या कहा जाए, क्योंकि यहाँ तो भाषा भी मौन है और कोई किसी का नहीं है

Read More

टूटते ख्वाबों की ग़ज़ल

गहन भावनाओं और रात के सन्नाटे के माध्यम से जीवन की नाजुकताओं और बेचैनियों को बयान करती है। लेखक की नींद में खलल डालने वाली घटनाओं के माध्यम से यह व्यक्त किया गया है कि किस तरह अचानक आने वाली परिस्थितियाँ हमारी मानसिक शांति और हौसलों पर असर डालती हैं। रात भर दिल और चाँद दोनों रोते हैं, जो मानवीय संवेदनाओं का मिश्रण प्रस्तुत करता है। “इत्र सी सुगंध” और “तितलियों के पंखों पर रंग” जैसी छवियाँ जीवन की सुंदरता और नाजुकता को दर्शाती हैं, 

Read More

मन की बात

डिजिटल मीडिया के माध्यम से केवल प्रेरक कहानियाँ प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि उन अनसुने हीरों, संस्थाओं और व्यक्तियों को सामने लाना है जो लाइमलाइट से दूर रहकर अपने कार्य से बदलाव ला रहे हैं। पाठक को आमंत्रित किया गया है कि वे ऐसी रचनाएँ, समाचार, लेख, कविताएँ, कहानियाँ या ग़ज़लें पोर्टल पर भेजें, ताकि उनकी आवाज़ लोगों तक पहुँच सके। यह पोर्टल निःशुल्क है, और सभी रचनाओं का स्वागत किया जाता है, बशर्ते वे चोरी की न हों। इसे माध्यम बनाकर, ई-पत्रिका और डिजिटल समुदाय के जरिए सामाजिक और साहित्यिक योगदान को व्यापक दर्शकों तक पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है।

Read More

गीता उठा

क्यों रंगहीन हो जीवन तेरा, देखोयह बनफूल फिर से महक उठा। पियुष पी कर हो रहे जो उन्मत्त तब,विषधर की कल्पना से मैं जी उठा। रजत-कंचन ही है, चमकते सोच मत,आग में यूँ ती नहीं, वो जल उठा। अधर्म की जब-जब हो विजय,कर सामना तू धर्म का, धनुष उठा। क्यों दीन-हीन यूँ बन बैठे हो,जरा…

Read More

मैं नहीं जानती..

पितरों के प्रति सच्चे प्रेम, समर्पण और सेवा की भावनाओं को दर्शाता है। लेखक बताती हैं कि मृत्यु के बाद क्या होता है, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन जीवन में जो स्नेह, सेवा और प्रेम उन्होंने अपने पितरों को दिया, वही उनकी वास्तविक श्रद्धांजलि और पूजा है। जल-तर्पण, श्रद्धा, समर्पण और सेवा जैसी परंपराओं का सार वही है जो जीवन में किए गए कर्मों में प्रकट होता है। यह पाठ याद दिलाता है कि सच्चा धर्म और श्रद्धा भौतिक दान या रस्मों में नहीं, बल्कि अपने हृदय, कर्म और प्रेम में निहित होता है।

Read More

लालटेन

गाँव की छोटी-सी झोंपड़ियों और ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को उजागर करती है। अँधियारे में एक मृतप्राय दीपशिखा की तरह जीवन की झलक कहीं तहखाने में बंद पड़ी है। नेता केवल दिखावे के लिए चमक-धमक करते हैं, पर जब बत्ती बुझी होती है तो लालटेन भी घर को रोशन नहीं कर सकती। इसके बावजूद, झोपड़ी में रहने वाले कृशकाय लोग रातों को इस छोटी डिबरी-सी लालटेन की रौशनी से जीवन की आशा और संघर्ष को देख पाते हैं। यह कविता सामाजिक असमानता, संघर्ष और छोटे प्रकाश की महत्वता को सुंदर ढंग से चित्रित करती है।

Read More

ग़ज़ल

दिल-ए-नादाँ को रुसवा क्यों करें हम,ज़माने से यूँ शिकवा क्यों करें हम। हमारे दर्द को समझे नहीं वो,तो अपने मन को मैला क्यों करें हम। उन्हें बेपर्दगी का पास है जब,भला फिर उनसे पर्दा क्यों करें हम। जिसे परवाह उलफ़त की नहीं अब,उसी पर वक़्त ज़ाया क्यों करें हम। मुहब्बत कर ली क्या, आफ़त बुला…

Read More

मौन..

जब मन, शरीर और आत्मा एकसमान और संतुलित स्थिति में होते हैं, तब वास्तविक मौन का अनुभव होता है। ध्यान और मौन के अभ्यास से हम न केवल अपने मन को नियंत्रित कर सकते हैं, बल्कि ब्रह्मांड की शक्तियों और जीवन के गहरे रहस्यों से भी परिचित हो सकते हैं। नकारात्मक विचारों की तरह मन की उर्जा भी बिखरती रहती है, जिससे निर्णय क्षमता प्रभावित होती है। इसे शांत और सकारात्मक विचारों से भरकर, हम अपनी बौद्धिक क्षमता बढ़ा सकते हैं और आत्म-ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। यह अभ्यास निरंतरता और धैर्य मांगता है, पर धीरे-धीरे यह सुखद अनुभव और गहन आध्यात्मिक अनुभूतियों का मार्ग खोलता है।

Read More