मेरी यायावरी!
मेरी यायावरी ने मुझे एक अनवरत पथगामी बना दिया है, जैसे मैं इस धरा पर रहते हुए भी व्योम का वासी बन गया हूँ। मन को पल भर का चैन नहीं मिलता। स्मृतियों का इतिहास वह निरंतर रचता रहता है और क्षणभंगुर जीवन में नए-नए आकाश गढ़ता रहता है।
कभी यह मन वृक्ष की ऊँची फुनगी पर जा बैठता है, मधुर राग बनकर इतराता है। अगले ही पल जब तेज़ हवा का झोंका आता है तो तंद्रा भंग हो जाती है और यह यथार्थ की ज़मीन पर धड़ाम से गिर पड़ता है।
हर क्षण एक मृदुल तरंग उठती है। शब्दों के घाट पर नंगे पाँव घूमती भावनाएँ अकुलाई-सी मोती चुनती रहती हैं। उन्हीं मोतियों से स्वर्णिम अभिव्यक्तियाँ जन्म लेती हैं और तभी एक नया काव्य आकार पाता है