मनचाहे रंग…
वह चित्रकार थी, लेकिन कभी अपने चित्त और आत्मा के अनुरूप पूरी तरह नहीं रंग भर पाई। समाज उसे “बेचारी” कहता था। तब वह कृष्ण के सारथी की तरह अपने रथ को चलाती थी। अब वह स्वतंत्र है—बे लगाम घोड़े दौड़ाती है, वरदान मांगती है, और उपकार के बदले कुछ चाहती नहीं। आसमान नीला नहीं, धरती बंजर और पानी सूखा है, फिर भी वह अपने मनचाहे रंग अपनी आत्मा में भरती है, चाहे वह गणितीय नियमों के आधार पर हों। आज वह अब बेचारी नहीं, बल्कि वैचारगी और सशक्तता का प्रतीक है।