जाते हुए साल को सलाम

जाते हुए साल को सलाम कहते हुए दिसंबर धीरे-धीरे विदा लेता है। कुछ रिश्ते साथ रह जाते हैं, कुछ यादों की किताब में दर्ज हो जाते हैं। समय की इस यात्रा में कुछ सपने पूरे होते हैं, कुछ अधूरे रह जाते हैं और उम्र चुपचाप अपने हिस्से का हिसाब घटाती चलती है। बूढ़ा दिसंबर खट्टी-मीठी स्मृतियाँ सौंपकर जाता है, ताकि जनवरी नई उम्मीदों की रोशनी बिखेर सके

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बेटे का इंतजार करती मां की भावुक और प्यार भरी यादें –

जिसने अक्षर नहीं, जीवन पढ़ाः मेरी मां

बाई पढ़ी-लिखी नहीं थीं, पर जीवन की भाषा उन्हें पूरी तरह आती थी। बचपन की जिम्मेदारियों ने उन्हें समय से पहले माँ बना दिया। स्वाभिमान उनकी साँसों में था और ममता उनके कर्मों में। टूटकर भी न बिखरने वाली इस स्त्री ने चुपचाप पूरा घर थामे रखा और अंत में, हरी रेखाओं के बीच, अपने होने का आख़िरी संकेत दे गई।

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 सोच बदल गई

कभी-कभी हमारी भलाई की सोच भी सामने वाले के लिए बोझ बन जाती है. नीलम ने यह समझा कि उपहार की कीमत से ज़्यादा उसकी गरिमा और अपनापन मायने रखता है. सीमा के एक सधे हुए उत्तर ने नीलम की सोच बदल दी और यह सिखा दिया कि उपहार महँगा नहीं, बल्कि नया और सम्मानजनक होना चाहिए.

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विदा के उस मोड़ पर खड़ी यादें

विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद बादलों के पार एक जहान और भी है,यादों के दरमियान जो नहीं है, वह भी है.31 दिसंबर 2022 नानी नहीं रही यह मैसेज देखते ही हाथ-पाँव सुन्न हो गए. आँखों में आँसू आए और जम गए. होंठ फड़फड़ाए और खामोश हो गए. हालाँकि जानती थी, समझ भी रही थी, फिर…

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बड़ी होटल : जब खबरें साँस लिया करती थीं

बड़ी होटल केवल एक होटल नहीं थी, बल्कि पूरे गाँव की धड़कन थी। वाल्व वाले रेडियो की गूंज में लोग अपने सुख-दुख, गर्व और शोक साझा करते थे। वहीं से देश-दुनिया की खबरें गाँव की गलियों में उतरती थीं और पोरवाल परिवार की सेवा-परंपरा ने इसे सच्चा सूचना केंद्र बना दिया।

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भूत समझा, माइलस्टोन निकला

एक शाम, कसारी से महिदपुर रोड जाते समय सुनसान रास्ते और अंधेरे में 13-14 साल का मैं अकेला था। सफेद परछाई देखकर डर बढ़ा, लेकिन हनुमान चालिसा के जाप ने मेरी हिम्मत जगाई। बाद में पता चला कि डरावनी परछाई असल में माइलस्टोन थी। यह यात्रा साहस, डर और विश्वास की यादगार घटना बन गई।

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विनोद कुमार शुक्ल : देह से विदा, साहित्य में सदा

विनोद कुमार शुक्ल भले ही देह से विदा हो गए हों, पर उनकी लेखनी आज भी साँस लेती है। उनके शब्दों की मंत्रमुग्धता पाठक को यह एहसास कराती है कि सच्चा साहित्य कभी समाप्त नहीं होता, वह चेतना में जीवित रहता है।

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एक दुआ

यह कविता एक माँ के निःस्वार्थ प्रेम और आशीर्वाद की अभिव्यक्ति है, जहाँ वह अपने सुख और उम्र तक को त्याग कर संतान के लिए उज्ज्वल, सुरक्षित और छायादार जीवन की कामना करती है।

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पल्लवी रानी का काव्य संग्रह ‘चितचोर’ विमोचित

मुंबई प्रेस क्लब में आयोजित काव्य संग्रह ‘चितचोर’ के लोकार्पण अवसर पर साहित्यकारों ने कवयित्री पल्लवी रानी की कविताओं को भारतीय सांस्कृतिक चेतना से जुड़ा बताया। डॉ. हरि जोशी ने उनकी रचनाओं में दिनकर और दुष्यंत कुमार की प्रतिध्वनि अनुभव करते हुए उन्हें भविष्य की सशक्त काव्य-सम्भावना बताया।

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जीवन एक संगीत

जीवन एक मधुर संगीत की तरह है, जिसमें सुख और दुःख उसके स्वरों की भाँति आते-जाते रहते हैं। संयम, विश्वास और परहित की भावना से भरा यह जीवन, गीता के ज्ञान को आत्मसात कर हर भव से पार हो सकता है। जब मन ईर्ष्या और लोभ से मुक्त होकर आशा, ममता और सत्य को अपनाता है, तब जीवन स्वयं एक संगीतमय चमन बन जाता है।

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