प्रेम होने तो दो

प्रेम की कथा इतनी सरल नहीं कि शब्दों में बाँधी जा सके। “धरती सब मसि कियो, लेखनी सब बनराई”—यह यूँ ही नहीं लिखा गया। जब प्रेम को लिखना चाहा, तो लेखनी ने हार मान ली। उसमें धूल, राख और व्यापार की कठोरता निकल पड़ी। क्योंकि प्रेम में कोई सौदा नहीं होता, कोई मोल नहीं होता।

कभी प्रेम में एक महामौन था, जिसमें न मिलने का डर था, न खोने का भय। स्त्री अपने घर की नींव संभालने आई, पुरुष घर को भरने कमाने निकला। पर प्रेम की अनुगूँज बहती रही—नदियों में, झरनों में, लहरों में, हवाओं में… बिना कहे, बिना सुने।

जो प्रेम को अभिशाप कहकर कोसता है, वह भी जानता है कि प्रेम होना ही सबसे बड़ा वरदान है। लेकिन प्रेम करने से पहले, उसे समझना, महसूस करना, जीना आना चाहिए।

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प्रेम पाक

हंडिया सी इस घाटी में एक दिन अवकाश का दो स्कूप बादल, रात भर भीगी गुनगुनी हवा, पेड़ों से छन कर आती  धूप के कुछ कतरे और  अंजुली भर पानी बारिश का उस पे बुरकना है  तुम्हारे सान्निध्य का  एक छोटा चम्मच मसाला … बस इतनी सी तो है इच्छा चलो दोनों मिल आज ढलते…

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बिदाई

बिदाई -गीता गैरोला मैं पतझड़ में खड़ा पेड़ हूं जिसे अपनी पत्तियों को विदाई देनी है जन्म के लिए मृत्यु उतनी ही जरूरी है जितनी मृत्यु के लिए जन्म जरूरी है मैं अपनी मिट्टी में उत्तप्त ऐसे खड़ी हूं जैसे मरने से पहले कोई प्रेम करने को आतुर खड़ा हो  या मरने के तुरंत बाद…

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खूंटी पर टंगी संवेदना..

लोग घर की खूँटी पर टांग कर निकलते हैं संवेदना… और फिर उन्हें नहीं फर्क पड़ता सड़क किनारे हो रहे हादसों से उन्हें नहीं फर्क पड़ता की एक युवक बार बार घोप रहा है हाथ में लिये अपने औजार को किसी युवती पर जो तड़प रही है दर्द से… लोग एक दूसरे को देखते हैं…

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