जहाँ कुचली जाती है, वहीं उगती है स्त्री

“जिन्हें तोड़ा जाता है, वे पीपल के समान फिर उगते हैं — पूरी शिद्दत के साथ।
जहाँ उम्मीदें नहीं होतीं, वहाँ भी हरे-भरे बने रहते हैं।
स्त्रियाँ भी ऐसी ही होती हैं — जहाँ कुचली जाती हैं,
वहीं अत्यंत सहनशीलता के साथ दोबारा उगती हैं।

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माँ की तपस्या, बेटी की उड़ान

“माँ ने अकेले दम पर बेटी को पाला — डॉक्टर बनने का सपना छोड़ा, किराए की दुकान, कॉल सेंटर, सब्ज़ी मंडी, हर मोर्चे पर संघर्ष किया। जलेबी नहीं खाई, लेकिन गाजर का हलवा बनाया। खुद तकलीफ में थी, पर बेटी के स्कूल प्रोजेक्ट में रातभर जागी। बेटी इंजीनियर बनी — माँ की आँखों से गवाही के आँसू गिरे।”

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कटहल! कटहल! कटहल!

कटहल सिर्फ सब्ज़ी नहीं, बचपन की मिठास है — नानाजी के घर पके कटहल का स्वाद, नानी के गोवा से लाए कटहल के तीखे पापड़, भुने हुए काजू और वो हँसी के ठहाके, जब हम सोचते थे कि हम ही हैं जो पूरा कटहल खा जाते हैं। अब सिर्फ स्वाद की यादें हैं — और हर मौसम में एक उम्मीद कि कहीं से फिर आ जाए वो पुराना कटहल…”

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छूटी हुई फोन कॉल्स के संकट ….

“छूटी हुई कॉल कोई साधारण घटना नहीं होती — वह जीवन के उन मोड़ों पर घटती है जहाँ या तो शरीर थक चुका होता है या मन भावनाओं के बोझ तले दबा होता है। एक फोन कॉल का न उठ पाना ट्रेन के छूटने जैसा नहीं, बल्कि बाल्यकाल के बीत जाने जैसा होता है — चुपचाप, पर स्थायी। यह कविता उसी चुप्पी और पछतावे का दस्तावेज़ है, जहाँ हर छूटी कॉल एक स्मृति बन जाती है — कभी अपराधबोध, कभी असहायता और कभी केवल मौन।”

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मुझमें कुछ भी नहीं है जिंदा….

तुम्हारे पते पर मुझे कोई आदमी नहीं मिला,
और अपने पते का मैं आदमी नहीं हूं।
मैं क्या कहती हूँ कुछ भी तो नहीं कहती,
पर कहती हूँ, बस कहती ही रहती हूं।”

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मैं मुक्त होना चाहती हूँ……

“मैं मुक्त होना चाहती हूँ —
अपने भय से, अपने अतीत से,
और उन तमाम बंदिशों से जो मुझे अंदर से तोड़ रही हैं।
यह मुक्ति मेरी आत्मा की जंग है,
एक सफर है अपने भीतर के उजाले की ओर…”

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“जब दिल धड़कता रहा, पर होंठ चुप रहे”

इतने सालों के बाद जब पीछे लौटकर देखता हूं, तो लगता है प्रेम और सौभाग्य कई बार मेरे दरवाज़े तक आए थे—पर मैं ही झेंपू, अनाड़ी और मौक़ा चूक जाने वाला रहा। कॉलेज की वो लड़की, लाइब्रेरी का वो एकांत, और वो घड़ी जब किसी के घर का पावभाजी मेरी याददाश्त का स्थायी हिस्सा बन गई—सब मुझे आज भी टटोलते हैं। और जब एक दिन किसी ने कहा, “तुम्हें ब्राह्मण समझकर बहन के लिए पसंद किया था,” तो लगा, क्या प्रेम जाति का मोहताज होता है?

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जब तितलियाँ सरहदों से परे उड़ती हैं

“युद्ध में न कोई जीतता है, न कोई हारता…
जो सबसे भयावह युद्ध होते हैं,
वो मांओं, पत्नियों और बच्चों के भीतर
बिना हथियार लड़े जाते हैं।
काश! तितलियाँ सरहदों से परे
एक ऐसे देश में ले जाएं,
जहां सिर्फ फूल हों,
और मां की गोद ही अंतिम शरण हो।”

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A lone Indian devotee performing dandavat parikrama on a forest path under full moonlight near Giriraj Hill, surrounded by calm nature, reflecting devotion, surrender, divine protection, and spiritual peace.

प्रेम, परिक्रमा और प्रसाद : जंगल में प्रभु की लीला

गिरिराज जी की दंडवती परिक्रमा केवल यात्रा नहीं, बल्कि समर्पण और कृपा का साक्षात अनुभव है। एकाकी पथिकों से भेंट, अस्वस्थता में प्रभु की सहायता, अजनबी हाथों से मिला प्रसाद, जंगल में जल-अन्न और रात्रि की पूर्णिमा में गिरिराज का सान्निध्य हर क्षण यह अनुभूति देता है कि जहाँ विश्वास है, वहाँ प्रभु स्वयं मार्गदर्शक बन जाते हैं।

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फिर से… सिर्फ अपने लिए

रेखा ने बचपन में जो कहानियाँ लिखना शुरू किया था, वो ज़िंदगी की दौड़ में कहीं खो गया था। लेकिन एक पुरानी सहेली की एक बात ने उसके भीतर की सोई हुई लेखिका को फिर जगा दिया। धूल भरी कॉपी, सूखे फूल, और अधूरी कहानियाँ — सब फिर से ज़िंदा हो उठे। कभी-कभी ज़िंदगी वहीं से शुरू होती है, जहाँ हमें लगता है कि सब कुछ खत्म हो गया है।

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