मां बनकर ढाल बनी आंगनवाड़ी रसोइया, मधुमक्खी हमले में बचाए 20 बच्चे

मधुमक्खियों के सैकड़ों डंक झेलकर 20 बच्चों को बचाया

उस सुबह आंगनवाड़ी परिसर में बच्चों की हंसी गूंज रही थी। किसी ने नहीं सोचा था कि कुछ ही मिनटों में यह जगह चीखों, अफरा-तफरी और मौत से टकराने वाली बहादुरी की गवाह बनने वाली है।
अचानक मधुमक्खियों का एक झुंड आंगनवाड़ी में खेल रहे बच्चों पर टूट पड़ा। नन्हे हाथ सिर ढकने लगे, मासूम आंखों में डर तैर गया

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IPS मल्लिका बनर्जी का अंडरकवर ऑपरेशन, भारत में बाल तस्करी के खिलाफ कार्रवाई

रियल लाइफ मर्दानी : मल्लिका बनर्जी

जब नौकरी के नाम पर बच्चे बेचे जा रहे थे और सिस्टम खामोश था, तब IPS मल्लिका बनर्जी ने वर्दी उतारकर अंडरकवर जंग लड़ी. यह कहानी सिर्फ़ बहादुरी की नहीं, भारत में फैली बाल तस्करी की कड़वी सच्चाई की है.

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एक वरिष्ठ पत्रकार टूटी बाइक और छोटी दीवार पर संतुलन बनाकर मोबाइल से फोटो लेते हुए, पीछे भीड़ और राजनीतिक कार्यक्रम का दृश्य, पत्रकारिता के जुनून का प्रतीक।

एक क्लिक, जो पत्रकारिता का प्रतीक बन गया

वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा का एक फोटो-क्लिक मीडिया में वायरल होकर खुद एक “ख़बर” बन
गए। राहुल गांधी के दौरे के दौरान उन्होंने जोखिम भरा एंगल लेकर फोटो खींचा, और उसी क्षण उनका यह एक्शन पत्रकारिता के असली जुनून और समर्पण का प्रतीक बन गया जिसे RK स्टूडियोज के प्रसिद्ध लोगो की तरह मध्यप्रदेश की पत्रकारिता का प्रतीक बनाया जा सकता है

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सिद्धार्थ पारधे : शून्य से शिखर तक

सिद्धार्थ पारधे का जीवन हमें सिखाता है कि अगर इरादे मजबूत हों और सही मार्गदर्शन मिले, तो इंसान फुटपाथ से उठकर महलों तक का सफर तय कर सकता है। उनकी विनम्रता, और जमीन से जुड़े रहने की भावना उन्हें बाकी सफल व्यक्तियों से अलग बनाती हैं। उनकी कहानी कंक्रीट के जंगल में संवेदनाओं की जीत की कहानी है।

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विजया निमला: ज़िंदगी की हर दौड़ में विजेता

57 वर्षीय विजया निमला के लिए रनिंग सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि ज़िंदगी का रूपक है। स्लिप डिस्क, फ्रैक्चर और ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी शारीरिक चुनौतियों को उन्होंने कभी अपनी मंज़िल के बीच नहीं आने दिया। फैशन डिज़ाइनिंग, पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ, समाजसेवा और फिटनेस — इन सभी को सहजता से संतुलित करते हुए उन्होंने यह साबित किया है कि उम्र सिर्फ एक संख्या है। अपने पति राजेंद्र निमला और फिटनेस-प्रेमी बच्चों के साथ उन्होंने जीवन की हर दौड़ में जीत हासिल की है और हर फिनिश लाइन को एक नई शुरुआत में बदल दिया है।

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सपनों की ऊंचाई: एक महिला अधिवक्ता की प्रेरक यात्रा

जब मैंने कोर्ट जॉइन किया, तब ज्यादातर अधिवक्ता पुरुष थे। यह मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती थी। पर मेरे सीनियर्स के सहयोग और अपने साहस के दम पर मैंने निडर होकर हर केस का सामना किया। मेरा पहला केस रेप का था — जिसे लेने में मुझे डर लग रहा था, लेकिन अनुभव ने सिखाया कि एक अच्छा अधिवक्ता वही है जो हर परिस्थिति के लिए तैयार रहे।

हाई कोर्ट तक पहुँचने की मेरी यात्रा यह साबित करती है कि बिना शिक्षा और मेहनत के कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता। परिवार का समर्थन और खुद पर विश्वास ही सफलता की असली कुंजी हैं।

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पत्रकारिता को धर्म की तरह धारण करने वाले पत्रकार दिनेशचंद्र वर्मा

स्वर्गीय दिनेश चंद्र वर्मा ने पत्रकारिता को सिर्फ व्यवसाय नहीं, बल्कि धर्म की तरह जिया। उनके लेख, विद्वत्ता और नैतिकता ने स्वतंत्र पत्रकारिता का आदर्श स्थापित किया। उनके व्यापक ज्ञान, गहरी समझ और अखबारों में लगातार प्रकाशित लेख उन्हें पत्रकारिता और साहित्य जगत में अनमोल बना देते हैं।”

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शाबाश… श्वेता

उज्जैन के छोटे कस्बे महिदपुर रोड से आई श्वेता बोथरा ने हौसले, दृढ़ निश्चय और लगन से बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाई। महेश भट्ट और अनु मलिक के साथ डेब्यू कर उन्होंने साबित कर दिया कि असंभव कुछ भी नहीं। शिक्षा पूरी करने और मीडिया मैनेजमेंट में एमबीए के बाद श्वेता ने ओरकॉम एडवरटाइजिंग, इंदौर से करियर शुरू किया, लेकिन लेखन का जुनून उन्हें मुंबई ले गया।

उनकी लिखी फिल्म “तू मेरी पूरी कहानी” एक ऐसी लड़की की कहानी है, जिसे प्यार और करियर के बीच कठिन निर्णय लेना होता है। श्वेता की कहानी हज़ारों लड़कियों और युवा महिलाओं के लिए प्रेरणा है—सपने देखने और उन्हें पूरा करने के लिए हौसला, मेहनत और जुनून ही सबसे बड़ा हथियार हैं।

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महिदपुर रोड के एक मंदिर परिसर में संतोष विश्वकर्मा श्रद्धालुओं के साथ खड़े, पारंपरिक परिधान में, सेवा और समर्पण का प्रतीक दृश्य

सेवा ही सबसे बड़ी साधना

महिदपुर रोड के समाजसेवी संतोष विश्वकर्मा (भूरा सेठ), जिन्हें लोग “टेम्पल मैन” के नाम से जानते हैं, अपनी गहरी धार्मिक आस्था और निस्वार्थ सेवाभाव के लिए पहचाने जाते हैं। मंदिरों के जीर्णोद्धार, नवदुर्गा महोत्सव के आयोजन और कांवड़ यात्राओं में उनका समर्पण समाज के लिए एक प्रेरणा है। उनका जीवन संदेश देता है कि सच्ची भक्ति वही है, जिसमें सेवा और विनम्रता का भाव हो।

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पिताजी और शिक्षक दिवस

मेरे लिए पिताजी ही जीवन के पहले शिक्षक थे। उनकी डाँट में करुणा थी और उनकी कठोरता में भी प्रेम छिपा था। उन्होंने केवल पढ़ाया नहीं, बल्कि सच्चाई, ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ जीना सिखाया। अद्भुत संयोग यह रहा कि शिक्षक होकर वे इसी शिक्षक दिवस के दिन इस संसार से विदा हुए—और अपने जीवन से यह अंतिम संदेश छोड़ गए कि सच्चा शिक्षक वही है, जो अपने आचरण और आदर्श से पीढ़ियों को दिशा देता है।

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