मीरा का मन
मीरा का जीवन समाज और परिवार की परंपराओं से परे, एक अद्भुत और अद्वितीय प्रेम का प्रतीक था। उसने राजमहल की सारी सुख-सुविधाएँ त्याग दीं और केवल अपने गिरधर गोपाल को ही अपना सर्वस्व मान लिया। जहाँ एक ओर लोग उसे समझाने का प्रयास करते कि कृष्ण तो राधा और रुक्मिणी के हैं, वहीं मीरा के लिए उनका प्रेम सांसारिक पाने और खोने से परे था। मीरा के हृदय में कृष्ण केवल पति या स्वामी नहीं, बल्कि आत्मा के आधार बन चुके थे। उसके लिए यह प्रेम किसी बंधन, किसी सामाजिक मान्यता से नहीं बंधा था। इसी अनुराग ने उसे विष भी अमृत जैसा प्रतीत कराया और हर पीड़ा को भक्ति में बदल दिया। मीरा का यह निस्वार्थ और आत्मिक प्रेम आज भी सच्चे समर्पण की अमिट मिसाल के रूप में जीवित है।