मीरा का मन

मीरा का जीवन समाज और परिवार की परंपराओं से परे, एक अद्भुत और अद्वितीय प्रेम का प्रतीक था। उसने राजमहल की सारी सुख-सुविधाएँ त्याग दीं और केवल अपने गिरधर गोपाल को ही अपना सर्वस्व मान लिया। जहाँ एक ओर लोग उसे समझाने का प्रयास करते कि कृष्ण तो राधा और रुक्मिणी के हैं, वहीं मीरा के लिए उनका प्रेम सांसारिक पाने और खोने से परे था। मीरा के हृदय में कृष्ण केवल पति या स्वामी नहीं, बल्कि आत्मा के आधार बन चुके थे। उसके लिए यह प्रेम किसी बंधन, किसी सामाजिक मान्यता से नहीं बंधा था। इसी अनुराग ने उसे विष भी अमृत जैसा प्रतीत कराया और हर पीड़ा को भक्ति में बदल दिया। मीरा का यह निस्वार्थ और आत्मिक प्रेम आज भी सच्चे समर्पण की अमिट मिसाल के रूप में जीवित है।

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बारह मासा 

“चैत्र की चपलता और बैसाख की तपिश से लेकर सावन की झूलों वाली हरियाली और भादो के घने बादलों तक, यह काव्य भारतीय मासों का रंगीन चित्र प्रस्तुत करता है। इसमें ऋतुओं के बदलते रंग, प्रकृति का सौंदर्य और ग्रामीण जीवन की सहज लय एक साथ बुनी गई है, जो पाठक को पूरे वर्ष के मौसम सफर पर ले जाती है।”

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सावन में जरूरी है सात्विक भोजन

सावन केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी विशेष होता है। इस महीने सात्विक भोजन अपनाना न केवल शिव आराधना में सहायक है बल्कि शरीर को हल्का, मन को शांत और आत्मा को निर्मल रखने का एक माध्यम भी है। इस बार सावन में सिर्फ आस्था नहीं, स्वास्थ्य की भी रक्षा करें — सात्विक जीवन अपनाएं।

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