
-सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज
बीएमसी ( बृहनमुंबई कार्पोरेशन) के चुनाव नतीजों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि राजनीति में स़िर्फ विरासत नहीं, बल्कि समय के साथ बदलती रणनीति ही सत्ता तय करती है. 25 वर्षों बाद बीएमसी से ठाकरे परिवार की विदाई को केवल उद्धव ठाकरे की एक गलती कहना आसान है, लेकिन सच्चाई इससे कहीं ज़्यादा गहरी और जटिल है. यह चुनाव दरअसल मुंबई के बदलते मतदाता की मानसिकता का आईना है. वह मतदाता, जो कभी भावनात्मक अपील, मराठी अस्मिता और परंपरागत निष्ठा के आधार पर वोट करता था, अब प्रशासनिक स्थिरता, विकास और स्पष्ट नेतृत्व को प्राथमिकता दे रहा है. उद्धव ठाकरे ने इस चुनाव में राज ठाकरे की मनसे के साथ गठबंधन कर भावनात्मक राजनीति को फिर से जीवित करने की कोशिश की. प्रतीकात्मक रूप से यह गठबंधन आकर्षक था, लेकिन चुनावी गणित के स्तर पर यह प्रयोग सफल नहीं हो पाया. मनसे की सीमित उपस्थिति यह संकेत देती है कि मुंबई अब केवल अस्मिता की राजनीति से आगे बढ़ चुकी है.
दूसरी ओर, कांग्रेस का अलग चुनाव लड़ना भी निर्णायक साबित हुआ. 24 सीटें भले ही कम लगें, लेकिन यही सीटें कई वार्डों में निर्णायक अंतर बनीं. अगर महाविकास अघाड़ी पूरी तरह एकजुट रहती, तो वोटों का बिखराव कम होता और तस्वीर अलग हो सकती थी. यह चूक किसी एक नेता की नहीं, बल्कि सामूहिक राजनीतिक समन्वय की थी.
भाजपा और एकनाथ शिंदे गुट की जीत को स़िर्फ विरोधियों की हार कहना भी गलत होगा. देवेंद्र फडणवीस की रणनीति, संगठन की मज़बूती और स्थिर शासन का स्पष्ट संदेश शहरी मध्यवर्ग में असर छोड़ने में सफल रहा. बीएमसी जैसे प्रशासनिक निकाय में मतदाता अब भावनाओं से ज़्यादा परिणाम देखना चाहता है. हालाँकि, उद्धव ठाकरे की शिवसेना का 65 सीटों तक पहुँचना यह भी बताता है कि उनकी राजनीतिक साख पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है. यह हार किसी अध्याय का अंत नहीं, बल्कि आत्ममंथन और पुनर्गठन का अवसर है. अंततः, बीएमसी की गद्दी एक गलती से नहीं छीनी गई, बल्कि इसलिए गई क्योंकि मुंबई बदल रही है. जो राजनीति इस बदलाव को समझेगी, वही भविष्य की मुंबई की कहानी लिखेगी.