
गार्गी रॉय, प्रसिद्ध लेखिका, पटना
“अहा! मिल गया… हम इसी घने पेड़ पर अपना बसेरा बनाएँगे।”
मैना ने उतावले स्वर में मैनी से कहा।
“तुम्हारा यहाँ रहना ठीक नहीं… कहीं और ठिकाना ढूँढ़ लो।”
पेड़ ने दोनों की बातें सुनकर उत्तर दिया।
“लेकिन क्यों?… हम दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। प्रकृति ने भी हमारे साथ को ऐसा ही बनाया है। जहाँ तुम, वहाँ हमारी प्रजाति। क्या हमारा रहना तुम्हें पसंद नहीं, भैया?”
मैनी ने उदास स्वर में पेड़ से कहा।
एक लंबी साँस भरते हुए घने पेड़ ने कहा,
“नहीं… नहीं, चिड़ियाँ रानी! तुम्हारा यहाँ रहना मुझे बहुत सुहाता है। तुम्हारा चहकना मेरा अकेलापन दूर करता है। तुम्हारे बच्चों को अपने आग़ोश में बढ़ते देखना एक सुखद अनुभूति है… परंतु…”
“परंतु क्या, भैया?”
चिड़िया ने आश्चर्य से पूछा।
पेड़ ने रुंधे गले से कहा,
“सुना है… कल से सड़क-चौड़ीकरण होगा।”