
वंशिका परसरामपुरिया, नवोदित लेखिका, मुंबई
हर घर बयाँ करता एक कहानी,
बयाँ करता एक रिश्ता,
कभी आधा-सा, तो कभी पूरा।
चलती हैं घरों में बातें,
कभी मीठी, तो कभी कड़वी,
कभी सच्ची, तो कभी झूठी।
आती है आवाज़ हँसी की, मुस्कुराहट की,
होते हैं झगड़े, होती है कड़वाहट,
मगर रहता है अपनापन,
रहता है सुकून।
न रह पाए लोगों के बिना,
न रह पाए परिवार के बिना।
हर दिन खींच लाए चेहरों की ओर,
खींच लाए सुकून की तरफ़,
उन लोगों की ओर,
जिनसे मिलती है हृदय को शांति।
नहीं बनता घर सिर्फ़ चार दीवारों से,
घर तो बनता है यादों से,
कसमों से, बीती रातों से।
वो घर ही क्या जहाँ अपना न हो,
वो अपने ही क्या जो परिवार न हो,
वो परिवार ही क्या जो जीने की वजह न हो।
हर घर बयाँ करता एक कहानी,
बयाँ करता एक प्रेम कहानी।
Bahut accha vanshika
Thank you
सटीक वर्णन किया आपने 4 दीवारों से घर नहीं बनता।
Thank you
Bahut sunder prastuti ek ghar ki
Thank you
अति सुंदर!
Thank you
Ek ghar ki bahut sunder prastuti
Thank you
बेहतरीन सृजन
Thank you
So good yaar ☺️
Thank you
Very good vanshika
So thoughtful
Thank you
सही कहा बेटा ,परिवार ही तो सुकून है । साथ रहने की प्रेरणा देती बेहतरीन प्रस्तुति
Thank you
सही कहा बेटा ,परिवार ही तो सुकून है । साथ रहने की प्रेरणा देती बेहतरीन प्रस्तुति
Thank you
Very nice poem
Thank you
Thank you