श्मशान से लौटती साँसें…

संध्या यादव, प्रसिद्ध कवयित्री, मुंबई

अभी -अभी घर लौटी हूँ

स्नान भी कर लिया है

अपने मृत शरीर को

कंधा दे आयी हूं न …

ज़ोर -ज़ोर से चिल्लाई भी

“राम नाम सत्य है “

खुद को विश्वास दिलाने के लिये

कि हाँ …मर गयी हूं मैं

सच में मर गयी हूं मैं …

साँस रोके खड़ी रही

श्मशान में अंतिम समय तक

ठंड़ी पड़ी राख को छूकर

अपने कंधे पर हाथ धर

दो मिनट के मौन के बाद

खुद को तसल्ली दे आयी

कि हाँ …मर गयी हूं मैं

सच में मर गयी हूं मैं…

स्नान कर गीले बालों को

लपेटा ही था कि याद आया

घर का किराया नहीं चुकाया

छोटी की फीस भरनी है

बड़ी की दवा लाना फिर भूल गयी

बनिये ने उधार चुकाने का मैसेज भेजा है…

दो महीने बाद बिजली कट सकती है

दफ्तर की फाइल आज रात पूरी करनी है

रिश्तेदार को शादी का शगुन भेजना है

सहेली का पुराना कर्ज चुकाना है

दो महीने बाद छोटी का जन्मदिन है

बड़ी की फेयरवेल पार्टी अगले हफ्ते…

चप्पल का अंगूठा

आज फिर उधड़ गया है

दाल फिर मंहगी हो गयी

दूध के दाम बढ़ गये

सब्जी दो दिन से नहीं बनायी…

एक फाँस सीने में काँच सी चुभी

मन ने समझाया

कब तक अपना

अंतिम दिन यूँ मनाओगी ?

मरने से पहले किश्तों में खुद को मार

मुक्ति का सुख पाओगी ?

बालों को लपेट

साड़ी कमर में खोंस

लग गयी हूँ जिंदगी की धूनी रमाने में

आज मैंने फिर मौत की आँखों में

अँजुरी भर धुँआ ड़ालकर

जिंदगी की सांसों को हवा दी है…

पांव पटकती जिम्मेदारी को

बांहों में भर ,माथे को चूम

वही पुराना रूठे को मनाने का

हथकंडा अपनाया है

समय के हाथों में आशाओं का

लेमन चूस रंग बिरंगा थमाया है

बरसों से गा रही हूं जो गीत

फिर वही दोहराया है

“आज जी लूं जी भर कर

फिर और कभी मर जाऊँगी “.

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