
सुरभि ताम्रकार, लेखिका, दुर्ग
प्रेम होने की परंपरा में
प्रेयसी हो चुके हैं कान्हा.
मीरा-सी भक्ति
करने का साहस कर लेता है मन.
यहाँ की रिवाज़ों में प्रेम विष है, कान्हा.
फिर भी क्या करूँ, अब डर पाता नहीं मन.
हम धीरे-धीरे तुम्हारे होते-होते
कब सुहागन हो चुके.
यह नियति जानती है,
और जानता है मेरा अंतर्मन.
राधा होना तय है या मीरा
होना मेरा.
यह तक़दीर मेरी किन लकीरों में
बेधुन उलझी है.
मोह के महाभारत से बचा सको
तो मेरे हो जाना बिना शर्त एक दिन.
अगर न हो हिस्से मेरे
प्रेम-आज्ञा में,
तो मुझे अपना दर्शन करा देना किसी दिन.
प्रेयसी हो चुके हैं, कान्हा,
प्रेम की परंपरा में.
मीरा ही बना लेना तुम्हारी
अगर सब कुछ हो मुश्किल.
अगर यह भी न हो मेरे नसीब में,
तो अपनी बाँसुरी ही बना
किसी प्रेम की गाथा का हिस्सा करना,
तुम निशदिन.
कमाल का लिखा है
वाह बहुत सुंदर भाव 👌👌