
सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज पुणे
वह समय जब मोबाइल तो दूर, उसकी कल्पना भी हमारे बचपन में नहीं थी.तब हमारे मनोरंजन के साधन बहुत सस्ते थे, पर यादों में बेहद महंगे. हर साल दो महीने की गर्मी की छुट्टियाँ बिताकर जब हम वापस महिदपुर रोड लौटते, तब तक आम का मौसम लगभग विदा ले चुका होता था. मई-जून में खाए गए आमों की गुठलियाँ लोगों द्वारा यूँ ही इधर-उधर फेंक दी जातीं. वही गुठलियाँ हमारी खुशियों की जड़ बन जाया करती थीं.
हम भगवतसिंहजी गार्ड के मकान में किराए से रहते थे. वहाँ तक जाने वाली गली में, उन्हीं फेंकी गई गुठलियों से छोटे-छोटे आम के पौधे अंकुरित हो जाया करते थे. देसी आम जिनके बारे में बड़े कहा करते थे, आम का पेड़ लगाओगे, तो पोते आम खाएँगे. आज तो दो साल में फल देने वाली कितनी ही किस्में आ गई हैं. अब सब कुछ फास्ट है..खाना भी, ज़िंदगी भी. पर तब समय धीरे चलता था और बचपन ठहरकर जीता था. उन नन्हें पौधों को हम उखाड़ लाते. घर लाकर पानी से अच्छी तरह धोते. गुठली का सख्त खोल हटाया जाताऔर भीतर से निकलता एक बीज.
यहीं से शुरू होता था असली खेल.
उस बीज को पत्थर पर घिसना हर किसी के बस की बात नहीं थी.
यह काम वही करता, जिसे हम हुनरमंद मानते थे.घिसते समय पंक्तियाँ गूंजतीं…आम्बा आम्बा वाज जे…और बीच-बीच में फूँक मारकर देखा जाता बज रहा है या नहीं. जैसे ही पहली बार आवाज़ आती, घिसाई रुक जाती और फूँकना शुरू.अगर हाथ ज़रा भी चूक गया, तो गुठली दो टुकड़ों में टूट जाती.और फिर शुरू होती…नए आम के पौधे की तलाश. चूँकि यह वेस्ट मटेरियल था,तो समझ लीजिए…लोग कहाँ फेंकते थे..और हम बच्चे कहाँ-कहाँ ढूंढते फिरते थे.और तब तक पहली गुठली तोड़ देने वाला कलाकार ..माथो मत खा!….की डाँट के बाद मार भी खा चुका होता पर अगले दिन फिर वही तलाश, फिर वही पत्थर, फिर वही फूँक,
और वही बचपन जो बिना किसी स्क्रीन के कितना रंगीन था.
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ,तो समझ आता है कि वह गुठली स़िर्फ खेलने की चीज़ नहीं थी. वह हमें धैर्य सिखाती थी..धीरे-धीरे घिसने का,टूटने से पहले रुक जाने का,और टूट जाए तो …फिर से तलाश शुरू कर देने का. शायद वही गुठली..मुझे ज़िंदगी की तैयारी करा रही थी. आज की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में,…जब सब कुछ तुरंत चाहिए..सफलता भी, संतोष भी..तो वह पत्थर पर घिसता बीज बार-बार याद आता है. याद आता है कि हर आवाज़ तुरंत नहीं आती, कुछ चीज़ें चुपचाप मेहनत माँगती हैं. कभी-कभी सोचता हूँ. अगर वह गुठली उस दिन टूट जाती थी,…तो मैं रोता नहीं था, बस दूसरी ढूँढने निकल पड़ता था.आज ज़िंदगी में कुछ टूटता है, तो वही बचपन मुझे चुपचाप कहता है..टूटना अंत नहीं है.
वह गली,वह पौधे,वह डाँट और मार..सब कुछ अब स्मृति बन चुका है, पर उन्हीं स्मृतियों नेमुझे आज तक टूटकर भी जुड़ना सिखाया है. अब आम की गुठली से बाजा नहीं बजता,पर जब ज़िंदगी में कभी कोई आवाज़..धीरे-धीरे जन्म लेती है, तो मुझे अपना बचपन मुस्कराकर याद आ जाता है और तब समझ में आता है..कुछ गुठलियाँ पेड़ नहीं बनतीं, पर इंसान ज़रूर बना देती हैं.
Very nice
Ha aaj kal। उंगलियां स्क्रीन में सीमित हो गई हैं।सुबह की शुरुआत भी इससे होती है,दौर बदलते है तकनीक बदल जाते है
आम की गुठली की पुंगी बचपन में हमने भी बहुत बनाई। बचपन की यादें और जीवन का फलसफा।
बहुत अच्छी तरह से दास्तां बयां की आपने।
बधाई एवं अभिनंदन।
बहुत सच लिखा है आपने, अब सब कुछ कितना फास्ट है, बनना, टूटना , बिखरना । खाना हो गया रिश्ते । प्रकृति की हर चीज अगर हम जिंदगी से जोड़कर देखें ….. तो एक सबक है । बहुत सुंदर लेख ।
Excellent
Bahut hi achha likha sir
बहुत ही प्यारी यादें रोचक संस्मरण
सुंदर लेखन आपका यादे समय और तकनीकी जीवन👌👌👌👌💐💐