एक कतरा प्यार

मधु चौधरी, लेखिका, बोरीवली (मुंबई)

मेरे वजूद के एक छोटे से अंश से तुम प्यार कर बैठे,
मेरे वजूद का जो बाकी हिस्सा है
उसे तुम कैसे समझोगे?

मेरा आधा, मेरा पूरा, मेरा रब,
मेरा रक़ीब,
मेरा बचपन, मेरी जवानी और मेरा दीवानापन
तुम कैसे समझोगे?

मेरी खुशियाँ, मेरे ग़म, मेरे अवसाद के वे पल,
मेरे किस्से, मेरी कहानी,
मेरी तन्हाई के वो लम्हे
तुम कैसे समझोगे?

मेरा जीना, मेरा मरना, मेरा हँसना, मेरा रोना,
मेरा मन, मेरा तन, मेरी हार, मेरी जीत
तुम कैसे समझोगे?

क्योंकि तुम मुझसे नहीं,
मेरे वजूद के बस एक छोटे से
अंश से प्यार कर बैठे

5 thoughts on “एक कतरा प्यार

    1. हां, बिल्कुल ऐसा भी होता है । जब आप किसी इंसान को ऊपरी तौर पर जानते हैं, या थोड़ा बहुत पहचानते हैं, तो किसी को सिर्फ उस रूप से प्यार हो जाता है, लेकिन उस इंसान के अनदेखे, बड़े हिस्से से अनजान रहते हैं -जिसमें गलतियां , कमजोरी, परेशानियां, बुराईयां होती हैं। दूर से देखने पर जो दीवानापन लगता है , वही नजदीक जाते पर पागलपन लगता है, निर्भीकता से बोलना ,बदतमीजी लगता है । एक हिस्से से प्यार होना संभव है, पर निभाना नहीं

  1. बिल्कुल सटीक। किसी को उसकी संपूर्णता में चाहना, उसकी बुराईयों और अच्छाईयों के साथ स्वीकार करना किसी तपस्या से कम नहीं।

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