जब मैं बोली नहीं… और माँ ने सुन लिया

मधु चौधरी, लेखिका, बोरीवली (मुंबई)
आठवीं के परिणाम में जब मैथ्स में मेरे बहुत कम नंबर आए, तो मम्मी-पापा इसे लेकर काफी चिंतित थे। इसीलिए मम्मी ने घर पर ही मुझे मैथ्स पढ़ाने के लिए एक सर को बुला लिया।
मैं स्वभाव से बहुत कम बोलने वाली और शर्मीली लड़की थी। क्लास में भी मैं कभी किसी टीचर से कोई सवाल नहीं पूछती थी। अगर टीचर खुद कोई प्रश्न कर लेते, तो मैं चुपचाप सिर झुकाकर जवाब दे देती थी।
विवेक सर मुझे घर पर शाम 4 से 5 बजे तक पढ़ाने आते थे। वह समय माँ के आराम करने का होता था और मेरा छोटा भाई स्कूल से 6 बजे तक लौटता था। सर मुझे मेरे कमरे में पढ़ाते थे। शुरू-शुरू में मुझे सर से डर लगता था, लेकिन धीरे-धीरे मैं उनके साथ सहज होने लगी। विवेक सर दिखने में बहुत सुंदर थे।
पढ़ाते समय सर अक्सर मेरे सिर पर हाथ फेर दिया करते थे। यह मुझे अच्छा लगता था और इससे मैं प्रोत्साहित महसूस करती थी। जब मैं जल्दी से किसी सवाल का हल ढूँढ लेती, तो सर मेरी पीठ थपथपा देते थे।
उस दिन पहली बार जब सर ने मेरी पीठ थपथपाई, तो उनका हाथ वहीं रुक गया। सर का हाथ मेरी पीठ पर कभी ऊपर, कभी नीचे ऐसे रेंगने लगा जैसे वे कुछ ढूँढ रहे हों। मैं एकदम स्थिर हो गई थी; समझ नहीं आ रहा था कि क्या बोलूँ या क्या करूँ। तभी अचानक डोरबेल बजी और सर का हाथ वापस अपनी जगह पर आ गया।
तीन-चार दिन बाद, सर मुझे ज्यामिति (Geometry) पढ़ा रहे थे। मैं सवालों में पूरी तरह व्यस्त थी, तभी मैंने अपनी जाँघों पर सर की उंगलियों को महसूस किया। सर की उंगलियाँ मेरी जाँघों पर कभी ट्राएंगल (Triangle) बना रही थीं, कभी स्क्वायर और कभी सर्कल। मैंने स्कर्ट पहन रखी थी, और सर का हाथ मेरी स्किन और स्कर्ट के बीच में था। मैं एक बार फिर डर के मारे जड़ हो गई थी।
सर जाते वक्त मुझे होमवर्क देते और अक्सर मेरे गालों को थपथपा देते थे। अब यह रोज़ का सिलसिला हो गया था। सर कभी मेरी पीठ पर तो कभी मेरी जाँघों पर हाथ फिराते रहते और मैं बुत बन जाती थी। मैं कैसा महसूस कर रही थी, यह भावना मुझे खुद भी समझ नहीं आ रही थी। हाँ, लेकिन जब यह सिलसिला लगभग एक महीने चला, तो उसके बाद मुझे सर से डर लगना बंद हो गया और मुझे उनका इंतज़ार रहने लगा।
शुरू में लगता था कि यह बात मम्मा को बता दूँ। कई बार कोशिश भी की, पर शब्द मेरा साथ नहीं देते थे। डर लगता था कि पता नहीं मम्मा कैसे रिएक्ट करेंगी? क्या मम्मा मुझ पर गुस्सा करेंगी? या मम्मा सर को गुस्सा करके निकाल देंगी? मैं सर को हटाना नहीं चाहती थी क्योंकि उनके पढ़ाने से मुझे मैथ्स समझ आने लगा था और टेस्ट में मेरे मार्क्स भी अच्छे आने लगे थे।
मुझे नादानी में लगने लगा था कि विवेक सर मुझसे प्यार करने लगे हैं—वैसा वाला प्यार जो फिल्मों में हीरो, हीरोइन से करता है। अब मुझे 4 बजने का इंतज़ार रहता था। सर पहले कोई टॉपिक पढ़ाते, होमवर्क देते और फिर उनकी उंगलियाँ कभी मेरी जाँघों पर, कभी पीठ पर, तो कभी गर्दन पर रेंगने लगतीं।
एक दिन गर्दन से सर की उंगलियाँ थोड़ी नीचे की तरफ बढ़ने लगीं। पहली बार हिम्मत करके मैंने सर का हाथ वहाँ से हटा दिया और अपना काम करने लगी। तभी अचानक सर ने मेरी चेयर को ज़ोर से घुमाया, मुझे अपने पास खींचा और बहुत ज़ोर से मेरे गाल और फिर होंठों पर किस किया। मैं बुरी तरह डर गई थी। शर्म से मेरी आँखें नीचे थीं।
सर के जाने के बाद, मैंने माँ से कहा कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है और मैं चुपचाप चादर ओढ़कर सो गई। लेकिन असल में मैं सो नहीं रही थी, बल्कि रो रही थी। कैसा था यह स्पर्श? क्या बड़े लोग इसी तरह प्यार करते हैं? अगर मम्मा यह देख लेतीं तो मुझ पर बहुत गुस्सा होतीं ना? पापा को पता चलता तो वे मेरे बारे में क्या सोचते?
कुछ दिन बाद, विवेक सर ने मुझे ज़ोर से अपनी बाहों में भर लिया और मुझे यहाँ-वहाँ छूने लगे। तभी अचानक किसी के आने की आहट सुनकर सर ने मुझे धक्का देकर चेयर पर बिठा दिया और मुझे डाँटने लगे। मम्मा जैसे ही रूम में आईं, विवेक सर मुझे डाँट रहे थे – “तुमने होमवर्क क्यों नहीं किया है? आजकल तुम्हारा ध्यान पढ़ाई में बिल्कुल नहीं लग रहा है।”*
मैं सिर नीचे करके चुपचाप रोती रही। सर और मम्मा ने कुछ बातें की जो मुझे बिल्कुल सुनाई नहीं पड़ रही थीं। विवेक सर का ऐसा व्यवहार देखकर मेरे देखने और सुनने की शक्ति जैसे गायब हो गई थी।
अगले दिन जब विवेक सर आए, तो उन्होंने मेरी चेयर के पीछे खड़े होकर अपने दोनों हाथ मेरी टी-शर्ट के अंदर डाल दिए और कान में ‘सॉरी’ बोले।
यह सब कुछ इसी तरह 6 महीने तक चलता रहा। मेरे हाफ इयरली एग्जाम्स नज़दीक आ गए थे। अब मेरा मन पढ़ाई में कम और विवेक सर के बारे में सोचने में ज़्यादा लगता था।
एक दिन मैं और मम्मा बैठकर बातें कर रहे थे, तभी मम्मा के पास एक कॉल आया। दूसरी तरफ मम्मा की एक बहुत अच्छी सहेली प्रीति आंटी थीं। मम्मा उनसे बात करने लगीं। इधर धीरे-धीरे मम्मा के चेहरे के हाव-भाव बदलने लगे। मम्मा ने कहा— “ट्यूशन टीचर?”
मैं सिर्फ मम्मा की बातें सुन पा रही थी…
“उसकी इतनी हिम्मत?”
” अरे तूने अपनी बेटी को अकेला क्यों छोड़ा ” ?
*” तुझे नज़र रखनी चाहिए थी।” प्रीति
मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। मम्मा की बातचीत खत्म हुई, उन्होंने फोन रखा और कुछ देर सोचती रहीं। फिर उन्होंने मुझे अपने नज़दीक बिठाया और बोलीं, “बेटा, प्रीति आंटी की बेटी के साथ उसका ट्यूशन टीचर गलत व्यवहार कर रहा था, लेकिन उनकी बेटी ने कभी शिकायत नहीं की। बेटा, अगर कोई भी कभी तुम्हारे साथ इस तरह का गलत व्यवहार करे, तुम्हें गलत जगह पर टच करे, तो तुम बिल्कुल डरना मत और मुझे आकर बता देना। वैसे हमारे विवेक सर तो बहुत अच्छे हैं…”
यह सुनते ही मैं मम्मी की गोद में गिरकर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।
मम्मा घबरा कर बोलीं, “क्या हुआ बेटा? मुझे बताओ, मैं तुम्हारी सिर्फ माँ नहीं, दोस्त भी हूँ। तुम मुझसे सब कुछ शेयर कर सकती हो। तुम अगर चाहोगी तो मैं पापा को भी नहीं बताऊँगी।”
मम्मी की प्यार भरी बातें सुनकर मैं और भी ज़ोर से रोने लगी और रोते-रोते मैंने मम्मा को शुरू से लेकर अभी तक की सारी बातें बता दीं। तब मैंने देखा कि मम्मा भी रो रही थीं। उन्होंने मुझे गले से लगाया और कहा, “इसमें गलती तुम्हारी नहीं, मेरी है। मुझे ही विवेक सर पर इतना भरोसा नहीं करना चाहिए था और तुम्हें अकेला नहीं छोड़ना चाहिए था। तुम डरो मत, अब आगे से ऐसा कुछ भी नहीं होगा।”
अगले दिन जब विवेक सर आए, तो मम्मा ने उनसे दरवाज़े पर ही खड़े होकर कुछ बात की। मुझे नहीं पता मम्मा ने उनसे क्या कहा, पर सर वहीं से वापस चले गए।
उसके बाद मम्मा ने मेरे लिए दूसरी लेडी टीचर को बुलाया। जब नई टीचर पढ़ाती थीं, तो मम्मा वहीं आस-पास अपना कुछ काम कर रही होती थीं; अब वह मुझे अकेला नहीं छोड़ती थीं। मम्मा ने मुझे ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ के बारे में सब कुछ समझाया और कहा, “अब से तुम मेरी दोस्त हो, तुम सब कुछ मेरे साथ शेयर कर सकती हो।”
माता-पिता के लिए संदेश
यह कहानी केवल एक बच्ची की नहीं, बल्कि हमारे समाज की कई मासूम बच्चियों की हकीकत है। जो बहुत बार अनकही ही रह जाती है और बच्चियों के दिमाग पर एक सदमा आजीवन रहता है ।
हमेशा यह याद रखें कि विश्वास तोड़ने वाला व्यक्ति हमेशा नजदीकी रिश्तेदार या भरोसेमंद व्यक्ति ही होता है ।
बच्चों के साथ संवाद बराबर बनाए रखें
उन्हें भरोसा दिलाए ताकि वह अपनी कोई भी समस्या आपके साथ खुलकर शेयर कर सकें ।
कोई भी व्यक्ति जब आपके बच्चों को पढ़ने घर आता है चाहे बच्चे किसी भी उम्र के क्यों ना हो दरवाजा खुला रखें
बहुत देर तक उन्हें अकेला ना छोड़े, और वहां अपना आना-जाना किसी न किसी बहाने से बनाए रखें ।
अगर आपका बच्चा किसी व्यक्ति विशेष के साथ विशेष रूप से असहज महसूस करता है तो इस बात को नजरअंदाज ना करें और बात की तह में जाने की कोशिश करें ।
Bahut accha likha hai mam aap ne. Esi hi bounding baccho ke sath honi chahiye .
धन्यवाद शालिनी जी
मधु जी आपने एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दे को एक सरल एवं प्रभावशाली कहानी के माध्यम से बड़ी सहजता से साझा किया है। बेटियों के माता-पिता को हमेशा alert mode पर ही रहना पड़ता है।
रेनू यह सिर्फ बेटियों की समस्या नहीं है, बेटों की भी है, वह पक्ष अभी काफी हद तक अनदेखा है ।
Really heart touching..its a very important talk..we all should teach our children not only girls but boys should also be aware of it what is good touch and bad touch…
बहुत अच्छा और संवेदनशील मुद्दा उठाया आपने. आमतौर पर लोग इस विषय पर लिखने से कतराते हैं.. आप लाखों लड़कियों और महिलाओं की आवाज बनी हो. बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं
आप के मार्गदर्शन और प्रोत्साहन के कारण ही इस विषय पर लिखने का साहस जुटा सकी। बहुत-बहुत आभार
The method of guiding parents n students through this story is quite good. Usually more guidance should be given in school by keeping lectures on good n bad touch.Many schools are conducting. Such lectures to be given to working ladies who leave their daughters on other near n dear friends, n of course relatives. U cannot rely on any one
Sbse mahtvpoorn mudda hai ye
बहुत सुंदर
बहुत ही नाजुक मुद्दे पर आपने कलम चलाई है। बिल्कुल माता पिता को बच्चों के प्रति अलर्ट रहना चाहिए।
Aisa samaz me aksar hota hi, or ye sach hai ki bacche dar ke mare kuch bhi bil nahi pate hai.
Baccho ko good touch or bad touch ke bare mai batana aavashayak hai.
Ghod one 👍👌👌
आज कल बच्चों को यह सब बताने की बहुत ज्यादा आवश्यकता है। संवेदनशील मुद्दे पर चर्चा करती हुई एक अच्छी प्रस्तुति