रेशमी कंबल

मीनाक्षी वर्मा, लेखिका, नई दिल्ली

बहुत पुराने वक्त की बात है। सीताराम नाम का एक आदमी झोपड़ी में रहता था और मजदूरी किया करता था। एक बार मजदूरी करते वक्त उसने एक आदमी को रश्मि कम्बल बेचते देखा। कम्बल देखकर उसका उसे खरीदने का मन हुआ, लेकिन उसके पास पैसे नहीं थे।वह घर आकर भी उसी कम्बल के बारे में सोचता रहा। सोचता उसमें सोने से कितनी अच्छी नींद आएगी, कितने अच्छे ख्वाब आएंगे। यही सोचकर उसे नींद नहीं आई। अब कई महीनों तक पैसे जोड़ता रहा।

एक दिन जब काफी पैसे जमा हो गए, तो उसने कम्बल खरीद लाया। पड़ोसी ने देखा तो उसे हाथ न लगाने दिया और झिड़का “महंगा है, हाथ मत लगाओ।” पड़ोसी को ईर्ष्या हुई। वह चिढ़कर बड़बड़ाया — “आया बड़ा कम्बल वाला!”

उस दिन सीताराम ने खाना भी न खाया, सारे दिन कम्बल में सोया रहा। काम पर भी न गया। अगले दिन जब काम पर जाने लगा, तो उसे कम्बल की फिक्र हुई — “इसे चूहे कुतर गए तो? किसी ने चुरा लिया तो?” उसने उसे चादर में बांधकर ऊपर की मेजानी में रख दिया। काम पर भी कम्बल की चिंता करने लगा “आज ही नया संदूक लाऊंगा और ताली भी।”
वह घर आते हुए संदूक और ताली भी ले आया। अब कम्बल में सोता और सुबह उसे ताली में बंद करके काम पर जाता।

महीनों बाद कम्बल गंदा दिखने लगा। उसने महंगा साबुन भी लाया, धोकर सुखाया। सुखा दिया, पर बाकी पड़ोसी नज़र लगाने लगे और बातें करने लगे — “ये तो अब कम्बल ही ओढ़ेगा और पहनेगा… हाहाहा।”
वह अनसुनी करता रहा। एक दिन काम पर गया, जब वापिस आया तो कम्बल गायब! “कहाँ चला गया? किसी ने चोरी कर लिया?” अड़ोस-पड़ोस में पूछा, लेकिन कुछ पता नहीं चला। वह बहुत रोया, उसे रात को नींद भी नहीं आई। कुछ दिन काम पर भी नहीं गया। धीरे-धीरे ग़म कम होने लगा। उसने सोचा “अच्छा ही हुआ जो चोरी हो गया। दिन-रात कम्बल, कम्बल करता रहता था। अपना सूती खेस ही अच्छा है, न खोने का डर, न चूहों का डर। अगर काट भी दें, तो दुख नहीं होता।”

इसके पीछे पड़ोसियों से भी संबंध खराब हुए। अब उसने पड़ोसी से भी माफी मांगी और अपने सूती खेस में आराम से सोने लगा। ऐसे ही मोह-माया में फंसकर सभी चिंता पाल लेते हैं, संबंध खराब करते हैं। चीजों से नहीं, लोगों से प्यार कीजिए। चीजें खोकर फिर बन जाएँगी, लोग खोकर वापस नहीं आएंगे।

12 thoughts on “रेशमी कंबल

      1. अच्छी कहानी है मीनाक्षी जी ।
        सूती से चलकर रेशमी कपड़ा खरीदने की क्षमता आते ही उसके खोने का डर उपज जाता है । डर से , आसपास सब से शक , नफ़रत भी पैदा हो जाते हैं ।
        हमें इस चक्र को तोड़कर सत्य की ओर ही विश्वास बढ़ाना चाहिए ।

  1. कंबल के माध्यम से सरल शब्दों में बहुत महत्वपूर्ण बात कही है।

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