
सुरेखा अग्रवाल स्वरा, प्रसिद्ध लेखिका
तुम मेरी स्मृतियों को जीवित रखते हो,
और मेरी स्मृतियाँ तुमसे सुवासित रहती हैं।
तुम्हारा होना
मेरे मस्तिष्क के भीतर कहीं उथल-पुथल-सी मचाए रहता है।
सोचती हूँ, कि इस मस्तिष्क के मृत होते ही
तुम कहाँ रहोगे…
इसलिए मैंने
प्रार्थनाओं में तुम्हें स्थान दिया है,
इसलिए मैंने
एक फल सोचकर, एक कर्म तुम्हें समर्पित किया है,
इसलिए मैंने
लक्ष्य नहीं साधा, प्रेमपथिक ही रहना स्वीकृत किया है,
इसलिए मैंने
प्रभु से कभी तुम्हें नहीं माँगा, तुम्हें सुखी माँगा है।
खूबसूरत लेखन
धन्यवाद
उम्दा
जी धन्यवाद
बहुत हि सुन्दर कविता !
आपकी टिप्पणी हमारी रचनात्मकता और कुछ नया करने के लिए प्रोत्साहित करती है, धन्यवाद, इसी प्रकार प्रेम बनाएं रखें.
धन्यवाद दी🙏
सुंदर रचना
आपकी टिप्पणी हमारी रचनात्मकता और कुछ नया करने के लिए प्रोत्साहित करती है, धन्यवाद, इसी प्रकार प्रेम बनाएं रखें.
धन्यवाद
धन्यवाद🙏🙏महानवमी शुभ हो