मेरी माँ 

सुरभि ताम्रकार, नवोदित लेखिका, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

मेरी माँ घर से बाहर जाती हैं,
पर घर को, घर पर छोड़ नहीं पाती।
उनकी गृहस्थी उनकी परछाई की तरह साथ चलती है।
रसोई उनके लिए वही जगह है, जहाँ बच्चे जैसी मासूमियत बसती है।

लोग कहते हैं, वह खास नहीं, केवल गृहिणी हैं।
पर मेरी माँ केवल गृहिणी नहीं, मेरी जीवनी हैं।
मैं उनकी शिष्या हूँ, मेरी प्रथम शिक्षिका।

उन्होंने सिखाए रंग और रंगों के अंतर,
फूल, फल, मसालों से।
उन्होंने सिखाए रिश्तों और संबंधों के मायने,
अनाज, सब्जी, दालों से।

उन्होंने पराठों, पकोड़ों से सिखाई विविध आकार और आकृतियाँ।
चांद, सितारे, ग्रह वाली रोटियाँ बनाकर खिलाई हैं।
उन्होंने मुझे इतिहास, भूगोल, गणित की बारीकियाँ सिखाईं।
सिखाया साहस, सहिष्णुता, और समग्रता।

उन्होंने दिया मुझे लगभग हर विषय का ज्ञान और जागरूकता।
और इन सभी में साथ रहे मेरे पिता,
हम दोनों को निखारने में।

लोग कहते हैं, मैं उनकी जैसी ही दिखती हूँ।
माँ मेरी मूलप्रति हैं, मैं उनकी प्रतिलिपि हूँ।
ऐसे हैं मेरी माँ,
सभी माँ जैसी, पर अपनी ही खासियत वाली।

घर से बाहर जाती हैं,
पर घर को, घर पर छोड़ नहीं पाती।
सभी की तरह, मेरी प्यारी माँ
केवल गृहिणी नहीं, मेरी जीवनी हैं।

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