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उस शाम…

रेखा हजारिका, प्रसिद्ध लेखिका, लखीमपुर

आपके कहने का इंतज़ार ही कहाँ था मुझे,
आपकी नज़रें… आपकी ख़ामोशी—
सब कुछ तो मेरे दिल में उतर रहा था।

जैसे कोई अनदेखी धारा
चुपचाप बहकर
मेरे हृदय को छू रही हो।

शाम के आसमान पर
टिमटिमाते तारे हमारे साक्षी थे,
और हरसिंगार की महक ने
वो सब कह दिया
जो आप शब्दों में कभी बाँध न पाए।

हम आमने-सामने बैठे थे,
पर लगा जैसे दिलों के द्वार
सदियों से एक-दूसरे के लिए प्रतीक्षा कर रहे हों।

दूर तक फैली चाँदनी ने हमें आच्छादित कर लिया,
और हरसिंगार की माला ने
हमारी आत्माओं को एक सूत्र में बाँध दिया।

उस पल न समय था, न दूरी—
सिर्फ़ आप थे… मैं थी…
और हमारा अनंत, मौन प्रेम।

2 thoughts on “उस शाम…

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