सोच बदल गई

मधु मिश्रा, प्रसिद्ध लेखिका, कोमना, नुआपड़ा (ओडिशा)

नीलम अपने घर के रंग रोगन का काम पूरा होते ही जब अपनी कपड़ों वाली आलमारी को जमाने लगी, तो उसने देखा… उसकी बहुत सी साड़ियाँ महँगी महँगी तो हैं, पर..! आउटडेटेड हो चुकी हैं..!कुछ दस साल पुरानी तो कुछेक पंद्रह और बीस साल पुरानी भी थीं.. और वो याद करने लगी “पिछली बार एक पार्टी में जब मैंने ये ग्रीन वाली साड़ी पहनी थी, तो मेरी भतीजी ने मेरी फोटो देखकर कहा था..” “बस बुआ..! पैसा वसूल हो चुका ना.. अब तो इसे छोड़ दो..!”

और मेरी बेटी भी भाई की शादी में जाते समय कुछ ऐसा ही कह रही थी I 

 – “मम्मी,मामा जी की शादी में आप सारी साड़ियाँ नई वाली ही पहनना .. आपके पुराने के मोह में तो आपके नये कपड़े भी पुराने हो जाते हैं “! 

और फ़िर… दिल पे पत्थर रखके… बहुत सोचने और विचारने के बाद, नीलम ने अपनी दो पसंदीदा साड़ियों को अपनी काम वाली बाई सीमा को ये कहते हुए दिया -” ले इस दीवाली का ईनाम एक साड़ी आठ हज़ार की है, और दूसरी तीन की है..!”

सीमा ने साड़ी ले ली, और घर के सारे काम निपटा कर घर चली गई l लेकिन उसके जाने के बाद नीलम ने देखा उसकी दोनों साड़ियाँ सीढ़ी के पास एक खूँटी में टंगी हुई है, उसे देखते ही नीलम आगबबूला होते हुए बड़बड़ाने लगी.. “ये देखो लाट साहब को इतनी महंगी साड़ी इसे मैंने दी.. और ये उसे यहीं छोड़ गई.. इन लोगों को पता नहीं, क्या चाहिये..! अरे..! इन लोगों को तो अपना सिर काट के भी दे दो ना.. तो बोलेंगे.. इनका सिर दर्द रहा होगा.. नमक हराम कहीं की..!कल आने तो दो..पूछूँगी, क्यों भई क्या हुआ..? कैसे..यहाँ छोड़ दी तूने साड़ी .?

दूसरे दिन सीमा आई.. नीलम मौन रहकर उससे घर के काम करवाती रही.. और आज भी काम ख़त्म होने के बाद जब वो फ़िर से उन साड़ियों को बिना लिये ही जाने लगी तो नीलम का गुस्सा सीमा पर फूट पड़ा – “क्यों रे.. क्या हुआ..! तू साड़ी क्यों नहीं ले गई..?” तो सीमा थोड़ी देर ख़ामोश रहने के बाद बोली – “भाभी, इतनी महंगी साड़ी..!अगर ले भी जाऊँ तो मैं पहन नहीं पाऊँगी.. क्योंकि.. जब भी पहनूँगी तो.. देखने वाले यही कहेंगे.. इतनी महँगी साड़ी इसके पास कैसे आई ..? ज़रूर चोरी की होगी..! भाभी..! आप चाहें तो दीवाली का कोई और ईनाम भले ही ना दें, पर मेरी नियत पर सवाल उठे..ये मुझे.. ?कहकर वो चुप हो गई …!

पर सीमा अपनी अधूरी बात..में ही .. वो सबकुछ कह गई.. जो नीलम की सोच के पूरी विपरीत थी…और सीमा से उन्हें ऐसा उत्तर मिलेगा ये उम्मीद तो बिल्कुल भी नहीं थी..! और अब नीलम गहरी श्वास लेते हुए सोचने लगी – “क्या मैंने ग़लत किया..? शायद हाँ.. कितनी सेवा करती है सीमा हमारी.. और मैंने उसे त्यौहार में मायूस कर दिया..” लेकिन आज उसने उपहार को लेकर मेरी सोच ही बदल दी.. “सच में किसी को दिया जाने उपहार क़ीमती भले ही ना हो पर नया तो होना ही चाहिए..!

One thought on “ सोच बदल गई

  1. अच्छा जिक्र किया है ,एक घटनाके माध्यम से उपहार की महत्ता बताने में,,,उपहार कीमत नहीं नीयत ओर उपयोग अनुसार देना सही है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *