ऊँची उठती तरंगें जब चाँद की छाँव में,
झिलमिलाती लहरें सजती हैं उस भाव में।
खुद में भरकर, अंबर को छूने का अरमान,
फिर लौट आती हैं शांत हो अपने ठाँव में।
सीखा है सागर ने समय के प्रवाह से,
हर रंग, हर पल बदलता इस राह से।
कभी मचलना, तो कभी थम जाना,
अपने ही भीतर के बुझते-सुलगते अलाव में।
चाँदनी की चादर में लहरें खोई-खोई,
वो रात की खामोशी में गहराई में सोई-सोई।
कभी सौम्य, तो कभी प्रबल स्वर की तरह,
सागर भी तो जीता है उस चांद के लगाव में।
एक सीख छुपी रहती हरदम इस खेल में,
कभी ऊँचा उठो, कभी शांत रहो ठेल में।
हर बूँद का एक सफर, हर धार का एक प्रवाह,
जीतना है कभी तो कभी हारना भी है दांव में।
कभी अनंत, तो कभी सीमित सा रह जाता,
जीवन का यह अक्स इन मौजों से मेल खाता।
लौट ही आती अपने पथ पर लहरें सागर की,
हर यात्रा भी खोजती है सुकून अपने पड़ाव में।

डॉ. शशिकला पटेल, असिस्टेंट प्रोफेसर आर. आर. एज्युकेशनल ट्रस्ट बी. एड. कॉलेज (मुलुंड पूर्व ) मुंबई