
प्रीति प्रधान, लेखिका, भिलाई
शक्ति हो माँ, तुम ममता की मूरत,
आकाश भी नतमस्तक है—
तू विशाल हृदया, धरती करे आरती,
तेरा धीरज अनुपम है।
तेरे आगे शब्द खो जाते हैं,
क्या माँगूँ मैं, जगत-जननी?
साथ न देती मेरी वाणी,
तेरा गुन गाने में हूँ अज्ञानी।
सुख हो या दुख, थाम लो हाथ,
ये जीवन है तेरा ही दान।
मेरी इक-इक साँस तुझी से है,
दिन-रात तेरा ध्यान।
आँखों में आ बसो अनिमेष,
इन पलक-सीपियों पर सदा विराजो।
चरण-कमल पर झुका रहे शीश,
अंत समय में दर्शन पाऊँ।
इक चंद्र-सी झलक के वास्ते,
माँ, रस्ता तेरा देख रही।
सुनो न दयारूपिणी,
मेरे जीवन की इक आशा यही।