वो शाम…

मीनू राजेश शर्मा, प्रसिद्ध लेखिका, रायपुर

वो शाम भी,
क्या शाम हुआ करती थी |
जब समंदर के किनारे,
मुलाक़ात हुआ करती थी |

आपके कांधे पे सर रख कर,
डूबते सूरज की लालिमा को निहारते थे हम |
समंदर की लहरों में लालिमा का प्रतिबिंब देख,
खो जाया करते थे हम |

समंदर की लहरों से उठती जल तरंगें,
प्यार का सरगम गाती थी |
आपके हाथों में मेरा हाथ,
सारे जहाँ की खुशियाँ देती थी |

समंदर किनारे,
खेलते बच्चों की आवाजें |
मासूमियत से भरे,
कई दृश्य थे |

आज भी वही शाम है,
वही समंदर का किनारा है |
वही लहरें, वही लालिमा है;
पर मेरा हमसफ़र, जाने कहाँ है?

आज मैं किनारे पर खड़ी,
समंदर को निहारती हूँ |
गुजरे हुए उस पल को,
गुजारे उन लम्हों को संजोती हूँ |

तड़पती हूँ आपके लिए,
आपके साथ के लिए, आपके प्यार के लिए |
लौट आओ फिर मेरी दुनिया में,
इतनी सी इल्तज़ा है ।

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