
सपना चन्द्रा , कहलगांव, भागलपुर (बिहार)
कुछ तो था उस पल में —
चाँद, कबूतर, सफेद बादल,
लालिमा ओढ़े उगता सूरज,
और टिप-टिप बरसती
बूँदों की रिमझिम बरसात,
इंद्रधनुष की सतरंगी पट्टी।
जाने कब इन आँखों में कैद हुई
चलती-फिरती हरेक तस्वीर,
चाहा उतार लूँ कागज पर
एक सुंदर सी तस्वीर,
उस छोर को याद करते हुए
जिससे मैं बंधी थी,
मगर उलझी हुई सी।
पर वक्त गवाह है
मौन संवाद की,
अलसाई भोर से
अलकों को समेटते,
बेतरतीबी में भी
उन ख्यालों से दूर नहीं थी।
इंतजार का हर लम्हा
उम्मीद पर अटका है —
कभी तो होगी मुलाकात
सुलझी हुई छोर से।
बहुत खूब।
वो पल जिनका एक छोर हमारी उलझनों से बंधा है और दूसरा छोर सुलझा है , बीच के जीवन में
सुलझाने की चेष्टाएं हैं ।
तस्वीर के आशावान पक्ष को ही मन में रखना
चाहिए।