
निरुपमा सिंह
कितने भी रावण जला लो
आज दस सिर वाले नहीं..
यहाँ एक सिर वाले,
बहुतेरे रावण मिलेंगें
तुम श्यामल वस्त्रों में लिपटा
रावण जलाते हो
आज श्वेत वस्त्रों में छुपे
अनेक रावण मिलेंगें।
तुम एक सीता हरण की बात करते हो
यहाँ प्रतिदिन कितनी ही
सीताओं का हरण होता है
साथ ही चीर-हरण भी
कितनी ही हर रोज़ ही
कहीं ना कहीं मासूमियत
नीलाम होती है
तत्पश्चात हवस की भट्टी में
भस्म होती है
यदि हो सके तो
इन सफेदपोश रावणों का दहन करो
करना ही है
तो इनका सर्वनाश करो !!
बिल्कुल सही
सम सामयिक स्थितियों पर सटीक तंज़ कसती एक बेहतरीन रचना। हार्दिक बधाई आपको।