आठ वर्षीय भानु अपनी मजदूर मां से बोला.. माँ आज़ भी मुझे ़फसल काटने संग में जाना होगा क्या?
और क्या?काम नहीं करेंगे तो खाएंगे क्या?
भानु ने चिरौरी की -पर मां मुझे तो आज़ स्कूल जाना है. नहीं गया तो कल क्लास में सज़ा मिलेगी.
मास्टर जी क्या पढ़ायेंगे? ख़ुद तो मोबाइल में घुसे रहते हैं. मां ने जानबूझ कर पूछा.
वे लिखने को दे देते हैं. नहीं लिखा तो खड़े रहो वाली सजा दे देते हैं. भानु बोला.
देख बेटा! मैं चाहूंं हूं कि तू पढ़ लिख कर कुछ बन जाए, तो ये काम कभी ना करने पड़े. और मजबूरी में साथ इसलिए ले जाऊंँ हूँ, के एक से भले दो होवे हैं.कह के मां चुप हो गईं क्योंकि इससे अधिक उस बच्चे को समझ कुछ आ भी नहीं सकता था.
साँझ तक गेहूं की फसल काटने के बाद रमिया मुट्ठी-मुट्ठी भर डालियों की अलग-अलग पूली बांध कर रखती रही. खेत के मालिक ने आकर हर बीस पूली (गड्डी) पर उन्नीस अपनी एक कटाईदार की अलग कर दी.
इस हिसाब से दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद भी कुल चार पूली रमिया को मिलीं. जिसे देख कर भानु मन ही मन तिलमिलाते हुए
सोच रहा था कि दिन भर उसकी माँ ने धूप में कितनी मेहनत से गेहूं काटे हैं और बदले में इतना थोड़ा अनाज उसके हिस्से में आया है. जबकि मैंने जो मांं का हाथ बंटाया है वह गिना ही नहीं. उसे चिंतित देख मां सोच रही थी कि वह मायके में लिख पढ़ नहीं पाई कि ब्याह हो गया, फिर पति का कम उम्र में ही देहांत हो गया. परिवार वालों ने मुंह फेर लिया तो बच्चों को रोटी की खातिर घर से बाहर निकलना ही पड़ा था.
वापसी के रास्ते में भानु ने मां से कहा-मां अब से मैं पूरी मेहनत से पढ़ाई करुंँगा. मुझे पढ़ लिखके नौकरी करना है, खेत खरीदने हैं,जिससे तुम्हं े किसी और की मजदूरी न करनी पड़े.
वह समझ गई थी कि आज भानु को पढ़ाई का महत्व और अच्छी तरह से समझ आ गया है.वह भी यही चाहती
रमिया ने भी मन ही मन फैसला कर लिया कि कल से वह अकेले ही खेतों में मेहनत मज़दूरी करने जाया करेगी

निरुपमा सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार,जनपद बिजनौर (उत्तरप्रदेश)